सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२०९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१७७
सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा

इस दृश्यसे मुझे प्रसन्नता नहीं हुई। किसीने भी प्रस्तावको समझनेका कष्ट नहीं उठाया। सब जल्दीमें थे। गोखलेने प्रस्ताव देख लिया था, इसलिए दूसरोंको देखने-सुननेकी आवश्यकता प्रतीत न हुई।

सवेरा हुआ। मुझे तो अपने भाषणकी फिक्र थी। पाँच मिनटमें क्या बोलूँगा? मैंने तैयारी तो अच्छी कर ली थी पर उपयुक्त शब्द सूझते न थे। लिखित भाषण न पढ़नेका मेरा निश्चय था। पर ऐसा प्रतीत हुआ कि दक्षिण आफ्रिकामें भाषण करनेकी जो स्वस्थता मुझमें आई थी, उसे मैं यहाँ खो बैठा था।

मेरे प्रस्तावका समय आने पर सर दिनशाने मेरा नाम पुकारा।[] मैं खड़ा हुआ। मेरा सिर चकराने लगा। जैसे-तैसे मैंने प्रस्ताव पढ़ा। किसी कविने अपनी कविता छपाकर सब प्रतिनिधियोंमें बांटी थी। उसमें परदेश जानेकी और समुद्र-यात्राकी स्तुति थी। वह मैंने पढ़ सुनाई, और दक्षिण आफ्रिकाके दुःखोंकी थोड़ी चर्चा की। इतनेमें सर दिनशाकी घंटी बजी। मुझे विश्वास था कि मैंने अभी पाँच मिनट पूरे नहीं किये हैं। मुझे पता न था कि यह घंटी मुझे चेतानेके लिए दो मिनट पहले ही बजा दी गई थी। मैंने बहुतोंको आध-आध, पौन-पौन घंटे बोलते देखा था और घंटी नहीं बजी थी। मुझे दुःख तो हुआ। घंटी बजते ही मैं बैठ गया। पर उक्त काव्यमें सर फीरोजशाहको उत्तर मिल गया,[] ऐसा मेरी अल्पबुद्धिने उस समय मान लिया। प्रस्ताव पास होनेके बारेमें तो पूछना ही क्या था?उन दिनों दर्शक और प्रतिनिधिका भेद क्वचित् ही किया जाता था। प्रस्तावोंका विरोध करनेका कोई प्रश्न ही नहीं था। सब हाथ उठाते ही थे। सारे प्रस्ताव सर्व-सम्मति से पास होते थे। मेरा प्रस्ताव भी इसी तरह पास हुआ। इसलिए मुझे प्रस्तावका महत्व नहीं जान पड़ा। फिर भी कांग्रेस में मेरा प्रस्ताव पास हुआ, यह बात ही मेरे आनन्दके लिए पर्याप्त थी। जिस पर कांग्रेसकी मुहर लग गई, उसपर सारे भारतकी मुहर है, यह ज्ञान किसके लिए पर्याप्त न होगा?

 

१६. लार्ड कर्जनका दरबार

कांग्रेस-अधिवेशन समाप्त हुआ, पर मुझे तो दक्षिण आफ्रिकाके कामके लिए कलकत्तेमें रहकर चेम्बर आफ कामर्स इत्यादि मण्डलोंसे मिलना था।इसलिए मैं कलकत्ते में एक महीना ठहरा। इस बार मैंने होटलमें ठहरनेके बदले परिचय प्राप्त करके ‘इंडिया क्लब’ में ठहरनेकी व्यवस्था की। इस क्लब में अग्रगण्य भारतीय उतरा करते थे। इससे मेरे मनमें यह लोभ हुआ कि उनसे मेलजोल बढ़ाकर उनमें दक्षिण आफ्रिका कामके लिए दिलचस्पी पैदा कर सकूँगा। इस क्लब में गोखले हमेशा तो नहीं, पर कभी-कभी बिलियर्ड खेलने आया करते थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि

  1. देखिए खण्ड ३, पृष्ठ २२९-३२।
  2. देखिए पृष्ठ १७२।
३९-१२