करनी है। उसके मिलने पर ही मुझे दूसरा कुछ सूझेगा। इस समय तो इस काम से मेरे पास एक क्षण भी बाकी नहीं बचता।”
रानडेके[१] प्रति उनका पूज्यभाव बात-बात में देखा जा सकता था। ‘रानडे यह कहते थे’, ये शब्द तो उनकी बातचीतमें लगभग ‘सूत उवाच’ जैसे हो गये थे। मैं वहाँ था उन्हीं दिनों रानडेकी जयन्ती (अथवा पुण्यतिथि, इस समय ठीक याद नहीं है) पड़ती थी। ऐसा लगा कि गोखले उसे हमेशा मनाते थे। उस समय वहाँ मेरे सिवा उनके मित्र प्रो॰ काथवटे और दूसरे एक सज्जन थे, जो सब-जज थे। इनको उन्होंने जयन्ती मनानेके लिए निमन्त्रित किया, और उस अवसरपर उन्होंने हमें रानडेके अनेक संस्मरण सुनाये। रानडे, तेलंग [२] और माण्डलिककी[३] तुलना भी की। मुझे स्मरण है कि उन्होंने तेलंगकी भाषाकी प्रशंसा की थी। सुधारकके रूपमें माण्डलिक की स्तुति की थी। अपने मुवक्किलकी वे कितनी चिन्ता रखते थे, इसके दृष्टान्तके रूपमें उन्होंने यह किस्सा सुनाया कि एक बार रोजकी ट्रेन छूट जानेपर वे किस तरह स्पेशल ट्रेनसे अदालत पहुँचे थे। और, रानडेकी चौमुखी शक्तिका वर्णन करके उस समयके नेताओंमें उनकी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध की थी। रानडे केवल न्यायमूर्ति नहीं थे। वे इतिहासकार थे, अर्थशास्त्री थे, सुधारक थे। सरकारी जज होते हुए भी वे कांग्रेस में दर्शककी तरह निडर भावसे उपस्थित होते थे। इसी तरह उनकी बुद्धिमत्ता पर लोगोंको इतना विश्वास था कि सब उनके निर्णयोंको स्वीकार करते थे। यह सब वर्णन करते हुए गोखलेके हर्षकी सीमा न रहती थी।
गोखले घोड़ागाड़ी रखते थे। मैंने उनसे इसकी शिकायत की। मैं उनकी कठिनाइयाँ समझ नहीं सका था। “आप सब जगह ट्राममें क्यों नहीं जा सकते? क्या इससे नेतावर्गकी प्रतिष्ठा कम होती है?”
कुछ दुःखी होकर उन्होंने उत्तर दिया: “क्या तुम भी मुझे पहचान न सके? मुझे बड़ी धारासभासे जो रुपया मिलता है, उसे मैं अपने काममें नहीं लाता। तुम्हें ट्राममें आते-जाते देखकर मुझे ईर्ष्या होती है, पर मैं वैसा नहीं कर सकता। जितने लोग मुझे पहचानते हैं उतने ही जब तुम्हें भी पहचानने लगेंगे, तब तुम्हारे लिए भी ट्राममें घूमना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जायेगा। नेता जो-कुछ करते हैं सो मौज-शौक के लिए ही करते हैं, यह माननेका कोई कारण नहीं है। तुम्हारी सादगी मुझे पसन्द है। मैं यथासम्भव सादगीसे रहता हूँ। पर तुम निश्चित मानना कि मुझ-जैसोंके लिए कुछ खर्च अनिवार्य हैं।”
इस तरह मेरी एक शिकायत तो ठीक ढंगसे रद हो गई।[४] पर दूसरी जो शिकायत मैंने को, उसका कोई सन्तोषजनक उत्तर वे नहीं दे सके।
- ↑ महादेव गोविन्द रानडे (१८४२-१९०१); समाज-सुधारक और लेखक; बम्बई उच्च न्यायालयके न्यायाधीश और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके संस्थापकोंमेंसे एक।
- ↑ काशीनाथ त्र्यंबक तेलंग (१८५०-१८९३); बम्बई उच्चन्यायालय के न्यायाधीश; भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके संस्थापकों में से एक।
- ↑ विश्वनाथ नारायण माण्डलिक (१८३३-१८८९); प्रसिद्ध वकील व सार्वजनिक कार्यकर्त्ता।
- ↑ देखिए खण्ड ३, पृष्ठ २४१।