मैं यह कह सकता हूँ कि इसी महीने में मैंने कलकत्तेकी एक-एक गली छान डाली। अधिकांश काम मैं पैदल चलकर करता था। इन्हीं दिनों मैं न्यायमूर्ति मित्रसे मिला। सर गुरुदास बनर्जी से मिला। दक्षिण आफ्रिकाके कामके लिए उनकी सहायता आवश्यक थी। उन्हीं दिनों मैंने राजा सर प्यारीमोहन मुखर्जीके भी दर्शन किये।
कालीचरण बनर्जीने मुझसे काली-मन्दिरकी चर्चा की थी। यह मन्दिर देखनेकी मेरी तीव्र इच्छा थी। मैंने उसका वर्णन पुस्तकमें पढ़ा था। इसलिए एक दिन वहाँ जा पहुँचा। न्यायमूर्ति मित्रका मकान उसी मुहल्लेमें था। अतएव जिस दिन उनसे मिला, उसी दिन काली-मन्दिर भी गया। रास्तेमें बलिदानके बकरोंकी लम्बी कतार चली जा रही थी। मन्दिरकी गली में पहुँचते ही मैंने भिखारियोंकी भीड़ लगी देखी। वहाँ साधु-संन्यासी तो थे ही। उन दिनों भी मेरा नियम हृष्ट-पुष्ट भिखारियोंको कुछ न देनेका था। भिखारियोंने मुझे बुरी तरह घेर लिया था। एक बाबाजी चबूतरे पर बैठे थे। उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा, “क्यों बेटा, कहाँ जाते हो?” मैंने समुचित उत्तर दिया। उन्होंने मुझे और मेरे साथियोंको बैठनेके लिए कहा। हम बैठ गये।
मैंने पूछा, “इन बकरोंके बलिदानको आप धर्म मानते हैं?”
“जीवकी हत्याको धर्म कौन मानता है?”
“तो आप यहाँ बैठकर लोगोंको समझाते क्यों नहीं?”
“हमारा यह काम नहीं है। हम तो यहाँ बैठकर भगवद्-भक्ति करते हैं।”
“पर इसके लिए आपको कोई दूसरी जगह न मिली?”
“बाबाजी बोले: “हम कहीं भी बैठें, हमारे लिए सब जगह समान है। लोग तो भेड़ोंके झुंडकी तरह हैं। बड़े लोग जिस रास्ते ले जाते हैं, उसी रास्ते वे चलते हैं। हम साधुओंको इससे क्या मतलब?”
मैंने संवाद आगे नहीं बढ़ाया। हम मन्दिरमें पहुँचे। सामने लहूकी नदी बह रही थी। दर्शनोंके लिए खड़े रहनेकी मेरी इच्छा न रही। मैं बहुत अकुलाया, बेचैन हुआ। वह दृश्य मैं अब तक भूल नहीं सका हूँ।
उसी दिन मुझे एक बंगाली सभाका निमन्त्रण मिला था। वहाँ मैंने एक सज्जन से इस क्रूर पूजाकी चर्चा की। उन्होंने कहा: “हमारा ख्याल यह है कि वहाँ जो नगाड़े वगैरा बजते रहते हैं, उनके कोलाहलमें बकरोंको चाहे जैसे भी मारो उन्हें कोई पीड़ा नहीं होती।”
उनका यह विचार मेरे गले न उतरा। मैंने उन सज्जनसे कहा कि यदि बकरोंके जबान होती तो वे दूसरी ही बात कहते। मैंने अनुभव किया कि यह क्रूर प्रथा बन्द होनी चाहिए। बुद्धदेववाली कथा मुझे याद आई। पर मैंने देखा कि यह काम मेरी शक्तिसे बाहर है।
उस समय मेरे जो विचार थे वे ही आज भी हैं। मेरे ख्यालमें बकरोंके जीवनका मूल्य मनुष्यके जीवनसे कम नहीं है। अपने मनुष्य-देहकी रक्षाके लिए मैं बकरेकी देह लेनेको तैयार न होऊँगा। मैं यह मानता हूँ कि जो जीव जितना अधिक अपंग है, उतना ही उसे मनुष्यकी क्रूरतासे बचनेके लिए मनुष्यका आश्रय पानेका अधिक अधिकार