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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२१५

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

है। पर वैसी योग्यताके अभाव में मनुष्य आश्रय देने में असमर्थ है। बकरोंको इस पापपूर्ण होमसे बचाने के लिए जितनी आत्मशुद्धि और त्याग मुझमें है, उससे कहीं अधिककी मुझे आवश्यकता है। जान पड़ता है कि अभी तो उस शुद्धि और त्यागका रटन करते हुए ही मुझे मरना होगा। मैं यह प्रार्थना निरन्तर करता रहता हूँ कि ऐसा कोई तेजस्वी पुरुष और ऐसी कोई तेजस्विनी सती उत्पन्न हो, जो इस महापातकसे मनुष्यको बचाये, निर्दोष प्राणियोंकी रक्षा करे और मन्दिरको शुद्ध करे। ज्ञानी, बुद्धिशाली, त्यागवृत्तिवाला और भावना-प्रधान बंगाल यह सब कैसे सहन करता है?

१६. गोखलेके साथ एक महीना――३

कालीमाताके निमित्तके होनेवाला विकराल यज्ञ देखकर बंगाली जीवनको जाननेकी मेरी इच्छा बढ़ गई। ब्रह्मसमाजके[] बारेमें तो मैं काफी पढ़-सुन चुका था। मैं प्रतापचन्द्र मजूमदारका[] जीवन-वृत्तान्त थोड़ा जानता था। उनके व्याख्यान मैं सुनने गया था। उनका लिखा केशवचन्द्र सेनका[] जीवन-वृत्तान्त मैंने प्राप्त किया और उसे अत्यन्त रस-पूर्वक पढ़ गया। मैंने साधारण ब्रह्मसमाज और आदि ब्रह्मसमाजका भेद जाना। पण्डित शिवनाथ शास्त्रीके[] दर्शन किये। महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुरके[] दर्शनोंके लिए मैं प्रो० काथवटेके साथ गया। पर वे उन दिनों किसीसे मिलते न थे, इससे उनके दर्शन न हो सके। उनके यहाँ ब्रह्मसमाजका उत्सव था। उसमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण पाकर हम लोग वहाँ गये थे और वहाँ उच्च कोटिका बंगाली संगीत सुन पाये थे। तभीसे बंगाली संगीतके प्रति मेरा अनुराग बढ़ गया।

ब्रह्मसमाजका यथासम्भव निरीक्षण करनेके बाद यह तो हो ही कैसे सकता था कि मैं स्वामी विवेकानन्द[] के दर्शन न करूँ? मैं अत्यन्त उत्साहके साथ बेलूर मठ तक लगभग पैदल पहुँचा। मुझे इस समय ठीकसे याद नहीं है कि मैं पूरा चला था या आधा। मठका एकान्त स्थान मुझे अच्छा लगा था। यह समाचार सुनकर मैं निराश हुआ कि स्वामीजी बीमार हैं। उनसे मिला नहीं जा सकता, और वे अपने कलकत्तेवाले घरमें हैं।

मैंने भगिनी निवेदिताके[] निवास-स्थानका पता लगाया। चौरंगीके एक महलमें उनके दर्शन किये। उनकी तड़क-भड़कसे मैं चकरा गया। बातचीत में भी हमारा मेल नहीं बैठा। मैंने गोखलेसे इसकी चर्चा की। उन्होंने कहा: “वह बड़ी तेज[] महिला हैं। अतएव उससे तुम्हारा मेल न बैठे, इसे मैं समझ सकता हूँ।”

  1. राजा राममोहन राय द्वारा सन् १८२८ में संस्थापित।
  2. २.० २.१ २.२ २.३ ब्रह्मसमाजके कर्णधार।,
  3. (१८६३-१९०२) रामकृष्ण परमहंसके शिष्य; वेदान्त दर्शनके व्याख्याता।
  4. मार्गरेट नोवल (१८६७-१९११); आयलैंड निवासिनी; स्वामी विवेकानन्दकी शिष्या।
  5. अंग्रेजी अनुवाद में ‘तेज’ के पर्यायवाचीको लेकर बादमें माडर्न रिव्यूने आपत्ति की थी। ‘तड़क-भड़क’ और ‘तेज’ के अनुवादमें रखे गये शब्द ‘वोलेटाइल’ के विषयमें गांधीजीने बादमें एक टिप्पणी लिखी थी। देखिए खण्ड ३४, पृष्ठ ८६-८८।