इसके बाद मैं दो बार और काशी-विश्वनाथके दर्शन कर चुका हूँ, पर वह तो ‘महात्मा’ बननेके बाद। अतएव १९०२ के अनुभव तो फिर कहाँसे पाता! मेरा ‘दर्शन’ करनेवाले लोग मुझे दर्शन क्यों करने देते? ‘महात्मा’ के दुःख तो मेरे-जैसे ‘महात्मा’ ही जानते हैं। अलबत्ता, गन्दगी और कोलाहल तो मैंने पहलेके जैसा ही पाया।
किसीको भगवानकी दयाके विषय में शंका हो, तो उसे ऐसे तीर्थक्षेत्र देखने चाहिए। वह महायोगी अपने नामपर कितना ढोंग, अधर्म, पाखण्ड इत्यादि सहन करता है? उसने तो कह रखा है:
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।[१]
अर्थात, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’। कर्मको मिथ्या कौन कर सकता है? फिर भगवानको बीचमें पड़नेकी जरूरत ही क्या है? वह तो अपने कानून बनाकर निवृत्त-सा हो गया है।
यह अनुभव लेकर मैं श्रीमती बेसेंट के दर्शन करने गया। मैं जानता था कि वे हाल ही बीमारीसे उठी हैं। मैंने अपना नाम भेजा। वे तुरन्त आईं। मुझे तो दर्शन ही करने थे, अतएव मैंने कहा: “मुझे आपके दुर्बल स्वास्थ्यका पता है। मैं तो सिर्फ आपके दर्शन करने आया हूँ। दुर्बल स्वास्थ्यके रहते भी आपने मुझे मिलनेकी अनुमति दी, इसीसे मुझे सन्तोष है। मैं आपका अधिक समय नहीं लेना चाहता।”
यह कहकर मैंने विदा ली।
२१. बम्बई में स्थिर हुआ?
गोखलेकी बड़ी इच्छा थी कि मैं बम्बई में बस जाऊँ, वहाँ बैरिस्टरका धन्धा करूँ और उनके साथ सार्वजनिक सेवामें हाथ बटाऊँ। उस समय सार्वजनिक सेवाका मतलब था, कांग्रेसकी सेवा। उनके द्वारा स्थापित संस्थाका मुख्य कार्य कांग्रेसकी व्यवस्था चलाना था।
मेरी भी यही इच्छा थी, पर काम मिलनेके बारेमें मुझे आत्म-विश्वास न था। पिछले अनुभवोंकी याद भूली नहीं थी। खुशामद करना मुझे विष-तुल्य लगता था।
इस कारण पहले तो मैं राजकोटमें ही रहा। वहाँ मेरे पुराने हितैषी और मुझे विलायत भेजनेवाले केवलराम मावजी दवे थे। उन्होंने मुझे तीन मुकदमे सौंपे। दो अपीलें काठियावाड़के ज्युडीशियल असिस्टेंट के सम्मुख थीं, और एक इब्तदाई मुकदमा जामनगरमें था। यह मुकदमा महत्वपूर्ण था। मैंने इस मुकदमेकी जोखिम उठानेसे आनाकानी की। इसपर केवलराम बोल उठे, “हारेंगे तो हम हारेंगे न? तुमसे जितना हो सके, तुम करो। मैं भी तो तुम्हारे साथ रहूँगा ही न?”
इस मुकदमे में मेरे विरोध में स्व० समर्थं वकील थे। मैंने तैयारी ठीक की थी। यहाँके कानूनका तो मुझे बहुत ज्ञान नहीं था। केवलराम दवेने मुझे इस विषय में पूरी तरह तैयार कर दिया था। मेरे दक्षिण आफ्रिका जानेसे पहले मित्र मुझे कहा
- ↑ गीता, ४-११।