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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२२४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

पैर तक लपेट दिया। ऊपरसे दो कम्बल ओढ़ा दिये। सिर पर गीला तौलिया रखा। बुखारसे शरीर तवेकी तरह तप रहा था और बिलकुल सूखा था। पसीना आता ही न था।

मैं बहुत थक गया था। मणिलालको उसकी माँके जिम्मे करके मैं आधे घंटेके लिए चौपाटी पर चला गया――थोड़ी हवा खाकर ताजा होने और शान्ति प्राप्त करनेके लिए। रातके करीब दस बजे होंगे। लोगोंका आना-जाना कम हो गया था। मुझे बहुत कम होश था। मैं विचार-सागरमें गोते लगा रहा था। हे ईश्वर! इस धर्म-संकटमें तू मेरी लाज रखना। ‘राम राम’ की रटन तो मुँहमें थी ही। थोड़े चक्कर लगाकर धड़कती छातीसे वापस आया।

घरमें पैर रखते ही मणिलालने मुझे पुकारा: “बापू, आप आ गये?”

“हाँ, भाई।”

“मुझे अब इसमें निकालिए न? मैं जला जा रहा हूँ।”

“क्यों, क्या पसीना छूट रहा है?”

“मैं तो भीग गया हूँ। अब मुझे निकालिए न, बापूजी!”

मैंने मणिलालका माथा देखा। माथे पर पसीने की बूंदें दिखाई दीं। बुखार कम हो रहा था। मैंने ईश्वरका आभार माना।

“मणिलाल, अब तुम्हारा बुखार चला जायेगा। अभी थोड़ा और पसीना नहीं आने दोगे?”

“नहीं, बापूजी! अब तो मुझे निकाल लीजिए। फिर दुबारा और लपेटना हो तो लपेट दीजियेगा।”

मुझे धीरज आ गया था, इसलिए उसे बातोंमें उलझाकर कुछ मिनट और निकाल दिये। उसके माथेसे पसीनेकी धाराएँ बह चलीं। मैंने चादर खोली, शरीर पोंछा और बाप-बेटे साथ सो गये।

दोनोंने गहरी नींद ली। सवेरे मणिलालका बुखार हलका हो गया था। दूध और पानी तथा फलोंके रस पर वह चालीस दिन रहा। मैं निर्भय हो चुका था। ज्वर हठीला था, पर वशमें आ गया था।

आज मेरे सब लड़कोंमें मणिलालका शरीर सबसे अधिक सशक्त है। मणिलाल का नीरोग होना रामकी देन है अथवा पानीके उपचारकी, अल्पाहारकी और सार-सँभालकी, इसका निर्णय कौन कर सकता है? सब अपनी-अपनी श्रद्धाके अनुसार जैसा चाहें, कहें। मैंने तो यह जाना कि ईश्वरने मेरी लाज रखी, और आज भी मैं यही मानता हूँ।