मैंने सोचा था कि मुझे एक वर्ष तो सहज ही लग जायेगा। इसलिए बँगला रहने दिया और बाल-बच्चोंको वहीं रखना उचित समझा।
उस समय मैं मानता था कि जो नौजवान देशमें कुछ कमाई न कर पाते हों और साहसी हों, उनके लिए परदेश चला जाना अच्छा है। इसलिए मैं अपने साथ चार-पाँच नौजवानोंको लेता गया। उनमें मगनलाल गांधी भी थे।
गांधी-कुटुम्ब बड़ा था। आज भी है। मेरी भावना यह थी कि उनमें से जो स्वतन्त्र होना चाहें, वे स्वतन्त्र हो जायें। मेरे पिता कइयोंको निभाते थे, पर रियासती नौकरीमें। मुझे लगा कि वे इस नौकरीसे छूट सकें तो अच्छा हो। मैं उन्हें नौकरियाँ दिलाने में मदद नहीं कर सकता था। शक्ति होती तो भी ऐसा करनेकी मेरी इच्छा न थी। मेरी धारणा यह थी कि वे और दूसरे लोग भी स्वावलम्बी बनें, तो अच्छा हो।
पर आखिर तो जैसे-जैसे मेरे आदर्श आगे बढ़ते गये (ऐसा मैं मानता हूँ), वैसे-वैसे इन नौजवानोंके आदर्शोंको भी मैंने अपने आदर्शोंकी ओर मोड़नेका प्रयत्न किया। उनमें मगनलाल गांधीको अपने मार्ग पर चलाने में मुझे बहुत सफलता मिली। पर इस विषयकी चर्चा आगे करूँगा।
बाल-बच्चोंका वियोग, बसाये हुए घरको तोड़ना, निश्चित स्थिति में से अनिश्चित में प्रवेश――यह सब क्षणभर तो अखरा। पर मुझे तो अनिश्चित जीवनकी आदत पड़ गई थी। इस संसारमें, जहाँ ईश्वर अर्थात् सत्यके सिवा कुछ भी निश्चित नहीं है, निश्चितताका विचार करना ही दोषमय प्रतीत होता है। यह सब जो हमारे आसपास दीखता है और होता है, सो अनिश्चित है, क्षणिक है। उसमें जो एक परमतत्व निश्चित रूपसे छिपा हुआ है, उसकी झाँकी हमें हो जाये, उसपर हमारी श्रद्धा बनी रहे, तभी जीवन सार्थक होता है। उसकी खोज ही परम पुरुषार्थं है।
यह नहीं कहा जा सकता कि मैं डर्बन एक दिन मी पहले पहुँचा। मेरे लिए वहाँ काम तैयार ही था। श्री चेम्बरलेनके पास प्रतिनिधि मण्डलके जानेकी तारीख निश्चित हो चुकी थी। मुझे उनके सामने पढ़ा जानेवाला प्रार्थना-पत्र[१] तैयार करना था और साथ जाना था।
चौथा भाग
किया-कराया चौपट?
श्री चेम्बरलेन दक्षिण आफ्रिकासे साढ़े तीन करोड़ पौंड लेने तथा अंग्रेजोंका और हो सके तो बोअरोंका मन जीतने आये थे। इसलिए भारतीय प्रतिनिधियोंको नीचे लिखा ठंडा जवाब मिला:
“आप तो जानते हैं कि उत्तरदायी उपनिवेशों पर साम्राज्य सरकारका अंकुश नाममात्रका ही है। आपकी शिकायतें तो सच्ची जान पड़ती है। मुझसे जो हो
- ↑ देखिए खण्ड ३, पृष्ठ २८६-९०।