सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२२७

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१९५
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

सकेगा, मैं करूँगा। पर आपको जिस तरह भी बने, यहाँके गोरोंको प्रसन्न रखकर रहना है।

जवाब सुनकर प्रतिनिधि ठंडे हो गये। मैं निराश हो गया। ‘जब जागे तभी सवेरा’ मानकर फिरसे श्रीगणेश करना होगा, यह बात मेरे ध्यानमें आ गई और साथियोंको मैंने समझा दी।

श्री चेम्बरलेनका जवाब क्या गलत था? गोलमोल बात कहनेके बदले उन्होंने साफ बात कह दी। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का कानून उन्होंने थोड़े मीठे शब्दों में समझा दिया।

पर हमारे पास लाठी थी ही कहाँ? हमारे पास तो लाठीके प्रहार झेलने लायक शरीर भी मुश्किलसे थे।

श्री चेम्बरलेन कुछ हफ्ते ही रहनेवाले थे। दक्षिण आफ्रिका कोई छोटा-सा प्रान्त नहीं है। वह एक देश है, खण्ड है। आफ्रिकामें तो अनेक उपखण्ड समाये हुए हैं। यदि कन्याकुमारीसे श्रीनगर १९०० मील है, तो डर्बनसे केपटाउन ११०० मीलसे कम नहीं है। इस खण्डमें श्री चेम्बरलेनको तूफानी दौरा करना था।

वे ट्रान्सवालके लिए रवाना हुए। मुझे वहाँके भारतीयोंका केस[] तैयार करके उनके सामने पेश करना था। प्रिटोरिया किस तरह पहुँचा जाये? वहाँ मैं समय पर पहुँच सकूं, इसके लिए अनुमति प्राप्त करनेका काम हमारे लोगोंसे बनने जैसा न था। युद्धके बाद ट्रान्सवाल उजाड़-जैसा हो गया था। वहाँ न खानेको अन्न था, न पहनने-ओढ़नेको कपड़े मिलते थे। खाली और बन्द पड़ी हुई दुकानोंको मालसे भरना और खुलवाना था। यह तो धीरे-धीरे ही हो सकता था। जैसे-जैसे माल इकट्ठा होता जाये, वैसे-वैसे ही घरबार छोड़कर भागे हुए लोगोंको वापस आने दिया जा सकता था। इस कारण प्रत्येक ट्रान्सवालवासी को परवाना लेना पड़ता था। और लोगोंको तो परवाना माँगते ही मिल जाता था। मुसीबत हिन्दुस्तानियोंकी थी।

लड़ाईके दिनोंमें हिन्दुस्तान और लंकासे बहुत-से अधिकारी और सिपाही दक्षिण आफ्रिका पहुँच गये थे। उनमें से जो लोग वहीं आबाद होना चाहें उनके लिए सुविधा कर देना ब्रिटिश राज्याधिकारियोंका कर्त्तव्य माना गया था। उन्हें अधिकारियोंका नया मण्डल तो बनाना ही था। उसमें इन अनुभवी अधिकारियोंका सहज ही उपयोग हो गया। इन अधिकारियोंकी तीव्र बुद्धिने एक नया विभाग ही खोल डाला। उसमें उनकी अपनी कुशल भी अधिक तो थी ही। हब्शियोंसे सम्बन्ध रखनेवाला एक अलग विभाग पहलेसे ही था। ऐसी दशामें एशियावासियोंके लिए भी एक विभाग क्यों न हो? दलील ठीक मानी गई। यह नया विभाग मेरे दक्षिण आफ्रिका पहुँचने से पहले ही खुल चुका था और धीरे-धीरे अपना जाल बिछा रहा था। जो अधिकारी भागे हुओंको वापस आनेके परवाने देता था वही सबको परवाने दे सकता था। पर उसे यह कैसे मालूम हो कि एशियावासी कौन है?इसलिए दलील यह दी गई कि नये विभागकी सिफारिश पर ही एशियावासियोंको परवाने मिला करें, तो उस

  1. देखिए खण्ड ३; पृष्ठ २९२-९६।