तुम्हें भी करना चाहिए।” आदि। मैंने उत्तरमें विनय-पूर्वक लिखा कि मैं पिताका ही काम कर रहा हूँ। कुटुम्ब शब्दका थोड़ा विशाल अर्थ किया जाये, तो मेरा निश्चय आपकी समझ में आ सकेगा।
माईने मेरी आशा छोड़ दी। एक प्रकारसे बोलना ही बन्द कर दिया। मुझे इससे दुःख हुआ। पर जिसे मैं अपना धर्म मानता था उसे छोड़नेमें कहीं अधिक दुःख होता था। मैंने कम दुःख सहन कर लिया। फिर भी भाईके प्रति मेरी भक्ति निर्मल और प्रचण्ड बनी रही। भाईका दुःख उनके प्रेममें से उत्पन्न हुआ था। उन्हें मेरे पैसोंसे अधिक आवश्यकता मेरे सद्व्यवहारकी थी। अपने अन्तिम दिनोंमें भाई पिघले। मृत्युशय्या पर पड़े-पड़े उन्हें प्रतीति हुई कि मेरा आचरण ही सच्चा और धर्मपूर्ण था। उनका अत्यन्त करुणाजनक पत्र मिला। यदि पिता पुत्रसे क्षमा माँग सकता है, तो उन्होंने मुझसे क्षमा माँगी। उन्होंने लिखा कि मैं उनके लड़कोंका पालन-पोषण अपनी नीति-रीतिके अनुसार करूँ। स्वयं मुझसे मिलनेके लिए अधीर हो गये। मुझे तार दिया। मैंने तारसे ही जवाब दिया: “आ जाइए।” पर हमारा मिलन बदा न था। उनकी अपने पुत्रों-सम्बन्धी इच्छा भी पूरी नहीं हुई। भाईने देशमें ही देह छोड़ी। लड़कों पर उनके पूर्व जीवनका प्रभाव पड़ चुका था। उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मैं उन्हें अपने पास खींच न सका। इसमें उनका कोई दोष नहीं था। स्वभावको कौन बदल सकता है? बलवान संस्कारोंको कौन मिटा सकता है? हमारी यह धारणा मिथ्या है कि जिस तरह हममें परिवर्तन होता है या हमारा विकास होता है, उसी तरह हमारे आश्रितों अथवा साथियोंमें भी होना चाहिए।
माता-पिता बननेवालेकी जिम्मेदारी कितनी भयंकर है, इसका कुछ अनुभव इस दृष्टान्तसे हो सकता है।
६. निरामिषाहारके लिए बलिदान
मेरे जीवन में जैसे-जैसे त्याग और सादगी बढ़ी और धर्म-जागृतिका विकास हुआ, वैसे-वैसे निरामिषाहारका और उसके प्रचारका मेरा शौक बढ़ता गया। प्रचार-कार्यकी एक ही रोति मैंने जानी है――वह है आचार और आचारके साथ जिज्ञासुओंसे वार्तालापकी।
जोहानिसबर्ग में एक निरामिषाहार गृह था। एक जर्मन, जो कुनेकी जल- चिकित्सा में विश्वास रखता था, उसे चलाता था। मैंने वहाँ जाना शुरू किया और जितने अंग्रेज मित्रोंको वहाँ ले जा सकता था उतनोंको ले जाने लगा। पर मैंने देखा कि यह भोजनालय बहुत दिनों नहीं चल पायेगा। उसे पैसेकी तंगी तो बनी ही रहती थी। मुझे जितनी उचित मालूम हुई उतनी मैंने उसकी मदद की। कुछ पैसे खोये भी। आखिर वह बन्द हो गया।
थियोसॉफिस्टों में अधिकतर निरामिषाहारी होते हैं; कुछ पूरे, कुछ अधूरे। इस मण्डल में एक साहसी महिला भी थी।[१] उसने बड़े पैमाने पर एक निरामिषाहारी
- ↑ देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ३६।