भोजनालय खोला। यह महिला कलाकी शौकीन थी। वह खुले हाथों खर्च करती थी पर हिसाब-किताबका उसे बहुत ज्ञान नहीं था। उसकी मित्र-मण्डली खासी बड़ी थी। पहले तो उसका काम छोटे पैमाने पर शुरू हुआ, पर उसने उसे बढ़ाने और बड़ी जगह लेनेका निश्चय किया। इसमें उसने मेरी मदद माँगी। उस समय मुझे उसके हिसाब आदिकी कोई जानकारी नहीं थी। मैंने यह मान लिया था कि उसका अन्दाज ठीक ही होगा। मेरे पास पैसेकी सुविधा थी। कई मुवक्किलोंके रुपये मेरे पास जमा रहते थे। उनमें से एकसे पूछकर उसकी रकम में से लगभग एक हजार पौंड उस महिलाको मैंने दे दिये। यह मुवक्किल विशाल हृदयका और विश्वासी था। वह पहले गिरमिटमें आया था। उसने (हिन्दी में) कहा: “भाई, आपका दिल चाहे तो पैसा दे दो। मैं कुछ ना जानूँ। मैं तो आप ही को जानता हूँ।” उसका नाम बदरी था। उसने सत्याग्रह में बहुत बड़ा हिस्सा लिया था। वह जेल भी भुगत आया था। इतनी सम्मति के सहारे मैंने उसके पैसे उधार दे दिये।
दो-तीन महीनोंमें ही मुझे पता चल गया कि यह रकम वापस नहीं मिलेगी। इतनी बड़ी रकम खो देनेकी शक्ति मुझमें नहीं थी। मेरे पास इस बड़ी रकमका दूसरा उपयोग था। रकम वापस मिली ही नहीं। पर विश्वासी बदरीकी रकम डूब कैसे सकती थी? वह तो मुझीको जानता था। यह रकम मैंने भर दी।
एक मुवक्किल मित्रसे मैंने अपने इस लेन-देनकी चर्चा की। उन्होंने मुझे मीठा उलाहना देते हुए जाग्रत किया:
“भाई, (दक्षिण आफ्रिकामे मैं ‘महात्मा’ नहीं बना था, ‘बापू’ भी नहीं हुआ था। मुवक्किल मित्र मुझे ‘भाई’ कहकर ही पुकारते थे।) यह आपका काम नहीं है। हम तो आपके विश्वास पर चलनेवाले हैं। यह पैसा आपको वापस नहीं मिलेगा। बदरीको तो आप बचा लेंगे और अपना पैसा खोयेंगे। पर इस तरह सुधारके कामों में सब मुवक्किलोंके पैसे देने लगेंगे, तो मुवक्किल मर जायेंगे और आप भिखमंगे बनकर घर बैठेंगे। इससे आपके सार्वजनिक कामको क्षति पहुँचेगी।”
सौभाग्य से ये मित्र अभी जीवित हैं। दक्षिण आफ्रिकामें और दूसरी जगह उनसे अधिक शुद्ध मनुष्य मैंने नहीं देखा। किसीके प्रति उनके मनमें शंका उत्पन्न हो और उन्हें जान पड़े कि वह शंका खोटो है, तो तुरन्त उससे क्षमा माँगकर वे अपनी आत्माको साफ कर लेते हैं।
मुझे इस मुवक्किलकी चेतावनी सच मालूम हुई। बदरीकी रकम तो मैं चुका सका। पर दूसरे हजार पौंड यदि उन्हीं दिनों मैंने खो दिये होते, तो उन्हें चुकानेकी शक्ति मुझमें बिल्कुल नहीं थी। उसके लिए मुझे कर्ज ही लेना पड़ता। कर्ज तो मैंने अपनी जिन्दगोमें कभी नहीं लिया और इसके लिए मेरे मनमें हमेशा ही बड़ी अरुचि रही है। मैंने अनुभव किया कि सुधार करनेके लिए भी अपनी शक्तिके बाहर जाना उचित नहीं था। मैंने यह भी अनुभव किया कि इस प्रकार पैसे उधार देनेमें मैंने गोताके तटस्थ निष्काम कर्मके मुख्य पाठका अनादर किया था। यह भूल मेरे लिए दीपस्तम्भ-सी बन गई।