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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२४४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

खोला। कस्तूरबाईको आँखोंसे गंगा-यमुना बह रही थी। वह बोली: “तुम्हें तो शर्म नहीं है। लेकिन मुझे है। जरा तो शरमाओ। मैं बाहर निकलकर कहाँ जा सकती हूँ? यहाँ मेरे माँ-बाप नहीं हैं कि उनके घर चली जाऊँ। मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, इसलिए मुझे तुम्हारी डाँट-फटकार सहनी ही होगी। अब शरमाओ और दरवाजा बन्द करो। कोई देखेगा, तो दोमें से एककी भी लाज नहीं बचेगी।”

मैंने मुँह तो लाल रखा, पर शरमिन्दा जरूर हुआ। दरवाजा बन्द कर दिया। यदि पत्नी मुझे छोड़ नहीं सकती थी, तो मैं भी उसे छोड़कर कहाँ जा सकता था? हमारे बीच झगड़े तो बहुत हुए हैं, पर परिणाम सदा शुभ ही रहा है। पत्नीने अपनी अद्भुत सहनशक्ति द्वारा विजय प्राप्त की है।

मैं यह वर्णन आज तटस्थ भावसे कर सकता हूँ, क्योंकि यह घटना हमारे बीते युगकी है। आज मैं मोहान्ध पति नहीं हूँ। शिक्षक नहीं हूँ। कस्तूरबाई चाहे तो मुझे आज डाँट सकती है। आज हम परखे हुए मित्र हैं, एक दूसरेके प्रति निर्विकार बनकर रहते हैं। कस्तुरबाई आज मेरी बीमारी में किसी बदलेकी इच्छा रखे बिना मेरी चाकरी करनेवाली सेविका है।

ऊपर की घटना सन् १८९८ की है। उस समय मैं ब्रह्मचर्य-पालनके विषय में कुछ भी नहीं जानता था। यह वह समय था जब मुझे इसका स्पष्ट मान नहीं था कि पत्नी केवल सहवर्मिणी है, सहचारिणी और सुख-दुःखकी साथिन है। मैं यह जानता हूँ कि उन दिनों में यह मानकर चलता था कि पत्नी विषय-भोगका साधन है, और वह पतिकी हर आज्ञाका पालन करनेके लिए सिरजी गई है।

सन् १९०० से मेरे विचारोंमें गम्भीर परिवर्तन हुआ। उसकी परिणति सन् १९०६ में हुई। पर इसकी चर्चा हम यथास्थान करेंगे। यहाँ तो इतना कहना काफी है कि जैसे-जैसे मैं निर्विकार बनता गया, वैसे-वैसे मेरी गृहस्थी शान्त, निर्मल और सुखी होती गई है और आज भी होती जा रही है।

इस पुण्यस्मरणसे कोई यह न समझ ले कि हम दोनों आदर्श पति-पत्नी हैं, अथवा मेरी पत्नी में कोई दोष ही नहीं है या कि अब तो हमारे आदर्श एक ही हैं। कस्तुरबाईके अपने कोई स्वतन्त्र आदर्श हैं या नहीं, सो वह बेचारी खुद भी नहीं जानती होगी। सम्भव है कि मेरे बहुतेरे आचरण उसे आज भी अच्छे न लगते हों। इसके सम्बन्ध में हम कभी चर्चा नहीं करते, करनेमें कोई सार नहीं। उसे न तो उसके माता-पिताने शिक्षा दी, और न जब समय था तब मैं दे सका। पर उसमें एक गुण बहुत ही बड़ी मात्रामें है, जो दूसरी बहुत-सी हिन्दू स्त्रियोंमें न्यूनाधिक मात्रामें रहता है। इच्छासे हो चाहे अनिच्छासे, ज्ञानसे हो चाहे अज्ञानसे, उसने मेरे पीछे-पीछे चलने में अपने जीवनकी सार्थकता समझी है, और स्वच्छ जीवन बितानेके मेरे प्रयत्न में मुझे कभी रोका नहीं है। इस कारण यद्यपि हमारी बुद्धि-शक्तिमें बहुत अन्तर है, फिर भी मैंने अनुभव किया है कि हमारा जीवन सन्तोषी, सुखी ओर उर्ध्वगामी है।