जन्म हुआ। मनसुखलाल नाजर इसके सम्पादक बने। पर सम्पादनका सच्चा बोझ तो मुझपर ही पड़ा। मेरे भाग्य में प्रायः हमेशा दूरसे ही अखबारकी व्यवस्था सँभालने का योग रहा है। मनसुखलाल नाजर सम्पादकका काम न कर सकें, ऐसी कोई बात न थी। उन्होंने देश में कई अखबारोंके लिए लेख लिखे थे, पर दक्षिण आफ्रिकाके अटपटे प्रश्नों पर मेरे रहते उन्होंने स्वतन्त्र लेख लिखनेकी हिम्मत नहीं की। उन्हें मेरी विवेक-शक्ति पर अत्यधिक विश्वास था। अतएव जिन-जिन विषयों पर कुछ लिखना जरूरी होता, उनपर लिखकर भेजनेका बोझ वे मुझपर डाल देते थे। यह अखबार साप्ताहिक था, जैसा कि आज भी है। आरम्भ में तो वह गुजराती, हिन्दी, तमिल और अंग्रेजी में निकलता था। पर मैंने देखा कि तमिल और हिन्दी विभाग नाममात्रके थे। मुझे लगा कि उनके द्वारा समाजकी कोई सेवा नहीं होती। उन विभागोंको रखने में मुझे असत्यका आभास हुआ। अतएव उन्हें बन्द करके मैंने शान्ति प्राप्त की।
मैंने यह कल्पना नहीं की थी कि इस अखबारमें मुझे अपने कुछ पैसे लगाने पड़ेंगे। लेकिन कुछ ही समय में मैंने देखा कि अगर मैं पैसे न दूं, तो अखबार चल ही नहीं सकता। मैं अखबारका सम्पादक नहीं था। फिर भी हिन्दुस्तानी और गोरे दोनों यह जानने लग गये थे कि उसमें प्रकाशित लेखोंके लिए मैं ही जिम्मेदार था। अखबार न निकलता तो भी कोई हानि न होती। पर एक बार निकालनेके बाद उसके बन्द होनेसे हिन्दुस्तानियोंकी बदनामी होगी और समाजको हानि पहुँचेगी, ऐसा मुझे प्रतीत हुआ। मैं उसमें पैसे उँडेलता गया, और कहा जा सकता है कि आखिर ऐसा भी समय आया, जब मेरी पूरी बचत उसी पर खर्च हो जाती थी। मुझे ऐसे समयकी याद है, जब मुझे अखबारके लिए हर महीने ७५ पौंड भेजने पड़ते थे।
किन्तु इतने वर्षोंके बाद मुझे लगता है कि इस अखबारने हिन्दुस्तानी समाजकी अच्छी सेवा की। इससे धन कमानेका विचार तो शुरूसे ही किसीका नहीं था। जब तक वह मेरे अधीन था, उसमें किये गये परिवर्तन मेरे जीवनमें हुए परिवर्तनोंके द्योतक थे। जिस तरह आज ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ मेरे जीवनके कुछ अंशों के निचोड़-रूप हैं, उसी तरह ‘इंडियन ओपिनियन’ था। उसमें मैं प्रति-सप्ताह अपनी आत्मा उँडेलता था, और जिसे मैं सत्याग्रहके रूप में पहचानता था, उसे समझानेका प्रयत्न करता था। जेलके दिनोंको छोड़कर दस वर्षोंके अर्थात् सन् १९१४ तकके ‘इंडियन ओपिनियन’ का शायद ही कोई अंक ऐसा होगा, जिसमें मैंने कुछ लिखा न हो। इसमें मैंने एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले लिखा हो या किसीको केवल खुश करनेके लिए लिखा हो अथवा जान-बूझकर अतिशयोक्ति की हो, ऐसा भी मुझे याद नहीं पड़ता। मेरे लिए यह अखबार संयमकी तालीम सिद्ध हुआ था; मित्रोंके लिए वह मेरे विचारोंको जाननेका माध्यम बन गया था। आलोचकोंको उसमें से आलोचनाके लिए बहुत कम सामग्री मिल पाती थी। मैं जानता हूँ कि उसके लेख आलोचकोंको अपनी कलम पर अंकुश रखनेके लिए बाध्य करते थे। इस अखबारके बिना सत्याग्रहकी लड़ाई चल नहीं सकती थी। पाठक-समाज इस अखबारको अपना