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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२५१

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

समझकर इसमें से लड़ाईका और दक्षिण आफ्रिकाके हिन्दुस्तानियोंकी दशाका सही हाल जानता था। इस अखबारके द्वारा मुझे मनुष्यके रंग-बिरंगे स्वभावका बहुत ज्ञान मिला। सम्पादक और ग्राहकके बीच निकटका और स्वच्छ सम्बन्ध स्थापित करनेकी ही धारणासे मेरे पास हृदय खोलकर रख देनेवाले पत्रोंका ढेर लग जाता था। उसमें तीखे कड़वे, मीठे यों भाँति-भाँतिके पत्र मेरे नाम आते थे। उन्हें पढ़ना, उनपर विचार करना, उनमें से विचारोंका सार लेकर उत्तर देना――यह सब मेरे लिए शिक्षाका उत्तम साधन बन गया था। मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो इसके द्वारा मैं समाजमें चल रही चर्चाओं और विचारोंको सुन रहा हूँ। मैं सम्पादकके दायित्वको भली-भाँति समझने लगा और मुझे समाजके लोगोंपर जो प्रभुत्व प्राप्त हुआ, उसके कारण भविष्यमें होनेवाला संघर्ष सम्भव हो सका, वह सुशोभित हुआ और उसे शक्ति मिली।

‘इंडियन ओपिनियन’ के पहले महीने के कामकाजसे ही मैं इस परिणाम पर पहुँच गया था कि समाचारपत्र सेवाभावसे ही चलाए जाने चाहिए। समाचारपत्र एक जबरदस्त शक्ति है, किन्तु जिस प्रकार निरंकुश पानीका प्रवाह गाँवके गाँव डुबा देता है और फसलको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार कलमका निरंकुश प्रवाह भी नाशकी सृष्टि करता है। यदि अंकुश बाहरसे आता है, तो वह निरंकुशतासे भी अधिक विषैला सिद्ध होता है। अंकुश अन्दरका ही लाभदायक हो सकता है। यदि यह विचारधारा सच हो, तो दुनियाके कितने समाचारपत्र इस कसौटी पर खरे उतर सकते हैं? लेकिन निकम्मोंको बन्द कौन करे? कौन किसे निकम्मा समझे? उपयोगी और निकम्मे दोनों साथ-साथ ही चलते रहेंगे। उनमें से मनुष्यको अपना चुनाव करना होगा।

१४. ‘कुली लोकेशन’ अर्थात् ‘भंगी बस्ती?’

हिन्दुस्तान में हम अपनी बड़ी-से-बड़ी सेवा करनेवाले ढेढ़, भंगी इत्यादिको, जिन्हें हम अस्पृश्य मानते हैं, गाँवसे बाहर अलग रखते हैं। गुजरातीमें उनकी बस्तीको ‘ढेढ़वाड़ा’ कहते हैं, और इस नामका उच्चारण करते समय लोगोंके मनमें नफरत होती है। इसी प्रकार यूरोपके ईसाई समाज में एक जमाना ऐसा था, जब यहूदी लोग अस्पृश्य माने जाते थे और उनके लिए जो ढेढ़वाड़ा बसाया जाता था उसे ‘घेटो’ कहते थे। यह नाम असगुनिया माना जाता था। इसी तरह दक्षिण आफ्रिकामें हम हिन्दुस्तानी लोग ढेढ़ बन गये हैं। एन्ड्रयूजके आत्मबलिदानसे और शास्त्रीजीकी[] जादूकी छड़ीसे हमारी शुद्धि होगी और फलतः हम ढेढ़ न रहकर सभ्य माने जायेंगे या नहीं, सो तो भविष्य बतायेगा।

हिन्दुओंकी भाँति यहूदियोंने अपनेको ईश्वरका प्रीतिपात्र और दूसरोंको अप्रीतिपात्र मानकर जो अपराध किया था, उसका दण्ड उन्हें विचित्र और अनुचित रीतिसे

  1. वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्री; मई १९२७ में दक्षिण आफ्रिकामें भारत सरकारके प्रतिनिधि नियुक्त हुए थे।