सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२५२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२२०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

प्राप्त हुआ था। लगभग उसी प्रकार हिन्दुओंने भी अपनेको सुसंस्कृत अथवा आर्य मानकर अपने ही एक अंगको प्राकृत, अनार्य अथवा ढेढ़ माना है। अपने इस पापका फल वे विचित्र रोतिसे और अनुचित ढंग से दक्षिण आफ्रिका आदि उपनिवेशोंमें भोग रहे हैं, और मेरी यह धारणा है कि उसमें अनेक पड़ोसी मुसलमान और पारसी भी, जो उन्हींके रंगके और देशके हैं, फँस गये हैं।

जोहानिसबर्ग कुली लोकेशनको इस प्रकरणका विषय बनानेका हेतु अब पाठकों की समझ में कुछ-कुछ आ गया होगा। दक्षिण आफ्रिकामें हम हिन्दुस्तानी ‘कुली’ के नामसे मशहूर हो गये हैं। यहाँ तो हम ‘कुली’ शब्दका अर्थ केवल मजदूर करते हैं। लेकिन दक्षिण आफ्रिकामें इस शब्दका जो अर्थ होता था, उसे ‘ढेढ़’, ‘पंचम’ आदि तिरस्कारवाचक शब्दों द्वारा ही सूचित किया जा सकता है। वहाँ कुलियोंके रहनेके लिए जो अलग जगह रखी जाती है, वह ‘कुली बस्ती’ कही जाती है। जोहानिसबर्ग में ऐसी एक ‘बस्ती’ थी। दूसरी सब जगहों में जो ‘बस्तियाँ’ बसाई गई थीं, और जो आज भी मौजूद हैं, उनमें हिन्दुस्तानियोंको कोई मालिकी हक नहीं होता। पर इस जोहानिसबर्गवाली बस्तीमें जमीन ९९ वर्षके लिए पट्टे पर दी गई थी। इसमें हिन्दुस्तानियोंकी आबादी अत्यन्त घनी थी। लोगोंकी संख्या बढ़ती थी, पर बस्तीका क्षेत्र नहीं बढ़ सकता था। उसके पाखाने जैसे-तैसे साफ अवश्य होते थे, पर इसके सिवा नगरपालिकाकी ओरसे और कोई विशेष देखरेख नहीं होती थी। वहाँ सड़क या रोशनीकी व्यवस्था तो होती ही कैसे? इस प्रकार जहाँ लोगोंके शौचादिसे सम्बन्ध रखनेवाली व्यवस्था की भी किसीको चिन्ता न थी, वहाँ सफाई कैसे होती? जो हिन्दुस्तानी वहाँ बसे हुए थे, वे शहरकी सफाई और आरोग्य इत्यादिके नियम जाननेवाले ऐसे सुशिक्षित और आदर्श हिन्दुस्तानी नहीं थे जिन्हें नगरपालिकाकी मददकी अथवा उनकी रहन-सहन पर नगरपालिकाकी देखरेखकी आवश्यकता न हो। यदि वहाँ जंगलमें मंगल कर सकनेवाले, धूलमें से धान पैदा करनेकी शक्तिवाले हिन्दुस्तानी जाकर बसे होते, तो उनका इतिहास सर्वथा भिन्न होता। ऐसे लोग बड़ी संख्या में दुनियाके किसी भी भागमे, परदेशमें, जाकर नहीं बसते। साधारणतः लोग धन और धन्धेके लिए परदेश जाते हैं। पर हिन्दुस्तान से मुख्यतः बड़ी संख्या में अपढ़, गरीब और दीन-दुःखी मजदूर ही गये थे। उन्हें तो पग-पग पर रक्षाकी आवश्यकता थी। उनके पीछे-पीछे व्यापारी और दूसरे स्वतन्त्र हिन्दुस्तानी जो गये, वे तो मुट्ठीभर ही थे।

इस प्रकार सफाईकी रक्षा करनेवाले विभागकी अक्षम्य असावधानीके कारण और हिन्दुस्तानी बाशिन्दोंके अज्ञानके कारण, आरोग्यकी दृष्टिसे उक्त बस्तीकी स्थिति बेशक खराब थी। नगरपालिकाने उसे सुधारनेकी थोड़ी भी उचित कोशिश नहीं की। परन्तु अपने ही दोषसे उत्पन्न हुई खराबीको निमित्त बनाकर सफाई विभागने उक्त बस्ती नष्ट करनेका निश्चय किया और वहाँकी धारासभासे उस जमीन पर कब्जा करनेका अधिकार प्राप्त किया। जिस समय मैं जोहानिसबर्गमें जाकर बसा था, उस समय वहाँकी हालत ऐसी थी।