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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२५६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

हम नर्सको क्वचित् ही बीमारोंको छूने देते थे। नर्स स्वयं छूनेको तैयार थी। वह भले स्वभावकी स्त्री थी। पर हमारा प्रयत्न यह था कि उसे संकटमें न पड़ने दिया जाये।

बीमारोंको समय-समय पर ब्रांडी देनेका सुझाव था। रोगकी छूतसे बचनेके लिए नर्स हमें भी थोड़ी ब्रांडी लेनेको कहती और खुद भी लेती थी। हममें कोई ब्रांडी लेनेवाला न था। मुझे तो बीमारोंको भी ब्रांडी देनेमें श्रद्धा न थी। डा॰ गॉडफ्रेकी इजाजतसे तीन बीमारों पर, जो ब्रांडीके बिना रहनेको तैयार थे और मिट्टीके प्रयोग करने को राजी थे, मैंने मिट्टीका प्रयोग शुरू किया और उनके माथे और छाती में जहाँ-जहाँ दर्द होता था, वहाँ-वहाँ मिट्टीकी पट्टी रखी। इन तीन बीमारोंमेंसे दो बचे। बाकी सब बीमारोंका देहान्त हो गया। बीस बीमार तो इस गोदाममें ही चल बसे।

नगरपालिकाकी दूसरी तैयारियाँ चल रही थीं। जोहानिसबर्गसे सात मील दूर एक ‘लेज़रेटो’ अर्थात् संक्रामक रोगोंके बीमारोंका अस्पताल था। वहाँ तम्बू खड़े करके इन तीन बीमारोंको उनमें पहुँचाया गया। भविष्य में महामारीके शिकार होनेवालों को भी वहीं ले जानेकी व्यवस्था की गई। हमें इस कामसे मुक्ति मिली।

कुछ ही दिनों बाद हमें मालूम हुआ कि उक्त भली नर्सको महामारी हो गई थी और उसीमें उसका देहान्त हुआ। वे बीमार कैसे बचे और हम महामारीसे किस कारण मुक्त रहे, सो कोई कह नहीं सकता। पर मिट्टीके उपचारके प्रति मेरी श्रद्धा और दवाके रूपमें भी शराबके उपयोगके प्रति मेरी अश्रद्धा बढ़ गई। मैं जानता हूँ कि यह श्रद्धा और अश्रद्धा दोनों निराधार मानी जायेंगी। पर उस समय मुझपर जो छाप पड़ी थी और जो अभी तक बनी हुई है, उसे मैं मिटा नहीं सकता। अतएव इस अवसर पर उसका उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ।

इस महामारीके शुरू होते ही मैंने तत्काल समाचारपत्रोंमें एक कड़ा पत्र[] लिखा था और उसमें वस्तीको अपने हाथ में लेनेके बादसे बढ़ी हुई नगरपालिकाकी लापरवाहीकी और महामारीके लिए उसकी जवाबदारीकी चर्चा की थी। इस पत्रने मुझे श्री हेनरी पोलकसे मिला दिया था, और यही पत्र स्व॰ जोजेफ डोकके परिचयका एक कारण बन गया था।

पिछले प्रकरणों में मैं लिख चुका हूँ कि मैं एक निरामिष भोजनालय में भोजन करने जाता था। वहाँ श्री अल्बर्ट वेस्टसे मेरी जान-पहचान हुई थी। हम प्रतिदिन शामको इस भोजनालय में मिलते और भोजनके बाद साथमें घूमने जाया करते थे। वेस्ट एक छोटे-से छापाखानेके साझेदार थे। उन्होंने समाचारपत्रों में महामारी विषयक मेरा पत्र पढ़ा और भोजनके समय मुझे भोजनालय में न देखकर वे घबरा गये।

मैंने और मेरे साथी सेवकोंने महामारीके दिनोंमें अपना आहार घटा लिया था। एक लम्बे समय से मेरा अपना यह नियम था कि जब आसपास महामारीकी हवा हो तब पेट जितना हलका रहे उतना ही अच्छा। इसलिए मैंने शामका खाना

  1. देखिए खण्ड ४, पृष्ठ १७०।