बन्द कर दिया था और दोपहरको दूसरे भोजन करनेवालोंको सब प्रकारके भयसे दूर रखनेके लिए मैं ऐसे समय पहुँचकर खा आता था जब दूसरे कोई पहुँचे न होते थे। भोजनालयके मालिकसे मेरी गहरी जान-पहचान हो गई थी। मैंने उससे कह रखा था कि चूँकि मैं महामारीके बीमारोंकी सेवामें लगा हूँ, इसलिए दूसरोंके सम्पर्क में कमसे-कम आना चाहता हूँ।
यों मुझे भोजनालय में न देखनेके कारण दूसरे या तीसरे ही दिन सबेरे-सबेरे जब मैं बाहर निकलनेकी तैयारीमें लगा था, वेस्टने मेरे कमरेका दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलते ही वेस्ट बोले: “आपको भोजनालयमें न देखकर मैं घबरा उठा था कि कहीं आपको तो कुछ हो नहीं गया। इसलिए यह सोचकर कि इस समय आप मिल ही जायेंगे, मैं यहाँ आया हूँ। मेरे योग्य कोई मदद हो तो मुझसे कहिए। मैं बीमारोंकी सेवा-शुश्रूषाके लिए भी तैयार हूँ। आप जानते हैं कि मुझपर अपना पेट भरनेके सिवा और कोई जवाबदारी नहीं है।”
मैंने वेस्टका आभार माना। मुझे याद नहीं पड़ता कि विचार करनेमें मैंने एक मिनट भी लगाया हो। तुरन्त कहा: “आपको नर्सके रूपमें तो मैं कभी न लूँगा। अगर नये बीमार न निकले तो हमारा काम एक-दो दिनमें ही पूरा हो जायेगा। लेकिन एक काम अवश्य है।”
“कौन-सा?”
“क्या आप डर्बन पहुँचकर ‘इंडियन ओपिनियन’ प्रेसका प्रबन्ध अपने हाथमें लेंगे? मदनजीत तो अभी यहाँके काममें व्यस्त हैं। परन्तु वहाँ किसीका जाना जरूरी है। आप चले जायें, तो उस तरफकी मेरी चिन्ता बिलकुल कम हो जाये।”
वेस्टने जवाब दिया: “यह तो आप जानते हैं कि मेरा अपना छापाखाना है। बहुत सम्भव है कि मैं जानेकी बात स्वीकार कर लूँ। आखिरी जवाब आज शाम तक दूं तो चलेगा न? घूमने निकल सकें तो उस समय हम बात कर लेंगे।”
मैं प्रसन्न हुआ। उसी दिन शामको थोड़ी बातचीत हुई। वेस्टको हर महीने दस पौंडका वेतन और छापाखाने में कुछ मुनाफा हो तो उसका अमुक भाग देनेका निश्चय किया। वेस्ट वेतनके लिए तो जा नहीं रहे थे। इसलिए वेतनका सवाल उनके सामने नहीं था। दूसरे ही दिन रातकी मेलसे वे डर्बनके लिए रवाना हुए और अपनी उगाहीका काम मुझे सौंपते गये। उस दिनसे लेकर मेरे दक्षिण आफ्रिका छोड़नेके दिनतक वे मेरे सुख-दुखके साथी रहे।
वेस्टका जन्म विलायतके एक परगनेके लाउथ नामक गाँवके एक किसान परिवारमें हुआ था। उन्हें साधारण स्कूली शिक्षा प्राप्त हुई थी। वे अपने परिश्रम से अनुभवकी पाठशाला में शिक्षा पाकर तैयार हुए शुद्ध, संयमी, ईश्वरसे डरनेवाले, साहसी और परोपकारी अंग्रेज थे। मैंने उन्हें हमेशा इसी रूपमें जाना है।
आगे इन प्रकरणों में हमें उनका और उनके कुटुम्बका अधिक परिचय मिलेगा।