सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२६३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२३१
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

नाम अलगसे लेता हूँ। क्योंकि दूसरे जो समझे थे, वे तो कम-ज्यादा समय फीनिक्समें रहने के बाद फिर द्रव्य-संचयमें व्यस्त हो गये थे। मगनलाल गांधी अपना धन्धा समेटकर मेरे साथ रहने आये, तबसे बराबर मेरे साथ ही रहे। अपने बुद्धिबलसे, त्याग-शक्तिसे और अनन्य भक्तिसे वे मेरे आन्तरिक प्रयोगोंके आरम्भके साथियोंमें आज मुख्य पदके अधिकारी हैं, और स्वयं-शिक्षित कारीगरके नाते मेरे विचारमें वे उनके बीच अद्वितीय स्थान रखते हैं।

इस प्रकार सन् १९०४ में[] फीनिक्सकी स्थापना हुई और अनेक विडम्बनाओंके बीच भी फीनिक्स संस्था तथा ‘इंडियन ओपिनियन’ दोनों अबतक टिके हुए हैं।[]

पर इस संस्थाकी आरम्भिक कठिनाइयाँ और उसमें मिली सफलताएँ-विफलताएँ विचारणीय हैं। उनका विचार हम दूसरे प्रकरणमें करेंगे।

२०. पहली रात

फीनिक्स में ‘इंडियन ओपिनियन’ का पहला अंक निकालना सरल सिद्ध न हुआ। यदि मुझे दो सावधानियाँ न सूझी होतीं, तो अंक एक सप्ताह बन्द रहता अथवा देरसे निकलता। इस संस्थामें एंजिनसे चलनेवाली मशीनें लगानेका मेरा विचार नहीं था। भावना यह थी कि जहाँ खेती भी हाथसे करनी है, वहाँ अखबार भी हाथसे चल सकनेवाले यन्त्रोंकी मददसे निकलें तो अच्छा हो। पर इस बार ऐसा प्रतीत हुआ कि यह हो न सकेगा। इसलिए हम वहाँ आइल एंजिन ले गये थे। किन्तु मैंने वेस्टको सुझाया था कि इस तैल-यन्त्रके बिगड़नेपर दूसरी कोई भी कामचलाऊ शक्ति हो तो अच्छा रहे। अतएव उन्होंने हाथसे चलानेका एक चक्र तैयार रखा था और उसकी मदद से मुद्रण-यन्त्रको चलानेकी व्यवस्था कर ली थी। इसके अलावा, हमारे अखबारका आकार दैनिक पत्रके समान था। बड़ी मशीनके बिगड़नेपर उसे तुरन्त सुधार सकनेकी सुविधा यहाँ नहीं थी। इससे भी अखबारका काम रुक सकता था। इस कठिनाईसे बचने के लिए उसका आकार बदलकर साधारण साप्ताहिकके बराबर कर दिया गया, जिससे अड़चनके समय ट्रेडल पर पैरोंकी मदद से कुछ पृष्ठ छापे जा सकें।

शुरूके दिनोंमें ‘इंडियन ओपिनियन’ प्रकाशित होनेके दिनकी पहली रातको तो सबका थोड़ा-बहुत जागरण हो ही जाता था। कागज मोड़नेके काममें छोटे-बड़े सभी लग जाते थे और काम रातको दस-बारह बजे पूरा होता था। पर पहली रात तो ऐसी बीती कि वह कभी भूल नहीं सकती। फर्मा मशीनपर कस दिया गया, पर एंजिनने चलनेसे इनकार कर दिया। एंजिनको बैठाने और चलानेके लिए एक इंजीनियर बुलाया गया था। उसने और वेस्टने बहुत मेहनत की, पर एंजिन चलता ही न था। सब चिन्तित हो गये। आखिर वेस्ट निराश होकर डबडबाई आँखोंसे मेरे पास आये और बोले: “अब आज एंजिन चलता नजर नहीं आता और इस सप्ताह हम लोग समयपर अखबार नहीं निकाल सकेंगे।”

  1. फीनिक्स आश्रमके उद्देश्योंके लिए देखिए खण्ड ११, पृष्ठ ३१८-२२।
  2. इसका प्रकाशन १९६१ में बन्द हो गया।