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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२६६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

यही नहीं, बल्कि थोड़े समय में छापाखानेकी सब क्रियाओंपर अच्छा प्रभुत्व प्राप्त करके उन्होंने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया।

अभी यह काम व्यवस्थित नहीं हो पाया था, मकान भी तैयार नहीं हुए थे, इतने में अपने इस नवरचित परिवारको छोड़कर मैं जोहानिसबर्ग भाग गया। मेरी स्थिति ऐसी न थी कि मैं वहाँके कामको लम्बे समयतक छोड़ सकूँ।

जोहानिसबर्ग पहुँचकर मैंने पोलकको इस महत्वपूर्ण परिवर्तनकी बात कही। अपनी दी हुई पुस्तकका यह परिणाम देखकर उनके आनन्दका पार न रहा। उन्होंने उमंगके साथ पूछा, “तो क्या मैं भी इसमें किसी तरह हाथ नहीं बँटा सकता?” “आप अवश्य हाथ बँटा सकते हैं। चाहें तो आप इस योजनामें सम्मिलित भी हो सकते हैं।” पोलकने जवाब दिया, “मुझे सम्मिलित करें तो मैं तैयार हूँ।”

उनकी इस दृढ़ता से मैं मुग्ध हो गया। पोलकने ‘क्रिटिक’ से मुक्ति पानेके लिए अपने मालिकको एक महीनेका नोटिस दिया और अवधि समाप्त होनेपर वे फीनिक्स पहुँच गये। वहाँ अपने मिलनसार स्वभावसे उन्होंने सबके दिल जीत लिये और घरके ही एक आदमीकी तरह वे रहने लगे। सादगी उनके स्वभावमें थी। इसलिए फीनिक्सका जीवन उन्हें जरा भी विचित्र या कठिन न लगकर स्वाभाविक और रुचिकर लगा। पर मैं ही उन्हें लम्बे समयतक वहाँ रख नहीं सका। श्री रिचने विलायत जाकर कानूनकी पढ़ाई पूरी करनेका निश्चय किया। मेरे लिए अकेले हाथों समूचे दफ्तरका बोझ उठाना सम्भव न था। अतएव मैंने पोलकको आफिसमें रहने और वकील बनने की सलाह दी। मैंने सोचा यह था कि उनके वकील बन जानेके बाद आखिर हम दोनों फीनिक्स ही पहुँच जायेंगे। ये सारी कल्पनाएँ मिथ्या सिद्ध हुई। किन्तु पोलकके स्वभावमें एक प्रकारकी ऐसी सरलता थी कि जिसपर उन्हें विश्वास हो जाता उससे बहस न करके वे उसके मतके अनुकूल बननेका प्रयत्न करते थे पोलकने मुझे लिखा: “मुझे तो यह जीवन ही अच्छा लगता है। मैं यहाँ सुखी हूँ। यहाँ हम इस संस्थाका विकास कर सकेंगे। किन्तु यदि आप यह मानते हों कि मेरे वहाँ पहुँचनेसे हमारे आदर्श शीघ्र सफल होंगे तो मैं आनेको तैयार हूँ।” मैंने उनके इस पत्रका स्वागत किया। पोलक फीनिक्स छोड़कर जोहानिसबर्ग आये और मेरे दफ्तर में वकीलके मुंशीकी तरह काम करने लगे।

इसी समय एक स्काच थियोसॉफिस्टको भी मैंने पोलकका अनुकरण करनेके लिए निमन्त्रित किया और वे भी आश्रममें सम्मिलित हो गये। उन्हें मैं कानूनकी परीक्षाकी तैयारीमें मदद करता था। इनका नाम मेकिनटायर था।

यों फीनिक्सके आदर्शको शीघ्र ही सिद्ध करनेके शुभ विचारसे मैं उसके विरोधी जीवनमें अधिकाधिक गहरा उतरता दिखाई पड़ा, और यदि ईश्वरी संकेत कुछ और ही न होता, तो सादे जीवनके नामपर बिछाये गये मोहजाल में मैं स्वयं ही फँस जाता।

मेरी और मेरे आदर्शकी रक्षा जिस रीतिसे हुई, उसकी हममें से किसीको कोई कल्पना नहीं थी। पर इस प्रसंगका वर्णन करनेसे पहले कुछ और प्रकरण लिखने होंगे।