मैंने पोलकको अपने साथ ही रहनेको बुला लिया और हम सगे भाइयोंकी तरह रहने लगे। जिस महिलाके साथ पोलकका विवाह हुआ, उसके साथ उनकी मित्रता तो कई वर्षोंसे थी। दोनोंने यथासमय विवाह करनेका निश्चय भी कर लिया था। पर मुझे याद पड़ता है कि पोलक थोड़ा धन-संग्रह कर लेनेकी बाट जोह रहे थे। मेरी तुलनामें रस्किनका उनका अध्ययन कहीं अधिक और व्यापक था। पर पश्चिमके वातावरण में रस्किनके विचारोंको पूरी तरह आचरण में लाने की बात उन्हें सूझ नहीं सकती थी। मैंने दलील देते हुए कहा, “जिसके साथ हृदयकी गाँठ बँध जाती है, केवल धनकी कमीके कारण उसका वियोग सहना अनुचित कहा जायेगा। आपके हिसाब से तो कोई गरीब विवाह कर ही नहीं सकता। फिर अब तो आप मेरे साथ रहते हैं। इसलिए घर-खर्चका सवाल ही नहीं उठता। मैं यही ठीक समझता हूँ कि आप जल्दी अपना विवाह कर लें।” मुझे पोलकके साथ कभी दूसरी बार दलील करनी ही नहीं पड़ती थी। उन्होंने मेरी दलील तुरन्त मान ली। भावी श्रीमती पोलक विलायत में थीं। उनके साथ पत्र-व्यवहार शुरू किया। वे सहमत हुई और कुछ ही महीनों में विवाह के लिए जोहानिसबर्ग आ पहुँचीं। विवाह में खर्च बिलकुल नहीं किया गया। विवाहकी कोई खास पोशाक भी नहीं बनवाई गयी। उन्हें धार्मिक विधिकी आवश्यकता न थी। श्रीमती पोलक जन्मसे ईसाई और श्री पोलक यहूदी थे। दोनोंके बीच सामान्य धर्म तो नीतिधर्म ही था।
पर इस विवाहका एक रोचक प्रसंग यहाँ लिख दूं। ट्रान्सवाल गोरोंके विवाहकी रजिस्ट्री करनेवाला अधिकारी काले आदमीके विवाहकी रजिस्ट्री नहीं करता था। इस विवाहका शहबाला मैं था। खोजनेपर हमें कोई गोरा मित्र मिल सकता था। पर पोलकके लिए वह सह्य न था। अतएव हम तीन व्यक्ति अधिकारीके सामने उपस्थित हुए। जिस विवाहमें में शहबाला होऊँ उसमें वर-वधू दोनों गोरे ही होंगे, अधिकारीको इसका भरोसा कैसे हो? उसने जाँच होनेतक रजिस्ट्री मुलतवी रखनी चाही। अगले रोज रविवार था। उसके बादका दिन नये सालका होनेसे सार्वजनिक छुट्टीका दिन था। व्याहके पवित्र निश्चयसे निकले हुए स्त्री-पुरुषके विवाहकी रजिस्ट्रीका दिन इस तरह बदला जाये, यह सबको असह्य प्रतीत हुआ। मैं मुख्य न्यायाधीशको पहचानता था। वे इस विभागके उच्चाधिकारी थे। मैं इस जोड़ेको लेकर उनके सामने उपस्थित हुआ। वे हँसे और उन्होंने मुझे चिट्ठी लिख दी। इस तरह विवाह-की रजिस्ट्री हो गई।
आजतक न्यूनाधिक ही सही, परन्तु जाने-पहचाने गोरे पुरुष मेरे साथ रहे थे। अब एक अपरिचित अंग्रेज महिलाने कुटुम्बमें प्रवेश किया। स्वयं मुझे तो याद नहीं पड़ता कि इस नव-विवाहित जोड़ेके कारण परिवारमें कभी कोई कलह हुआ हो। मेरे परिवारमें जहाँ अनेक जातियों और स्वभावोंके हिन्दुस्तानी आते-जाते रहे थे और मेरी पत्नीको अभीतक ऐसे अनुभव कम ही हुए थे। ऐसी परिस्थितिमें उन दोनोंके बीच कभी उद्वेगके अवसर आये भी होंगे। पर एक ही जातिके परिवारमें ऐसे अक्सर जितने आते हैं, उनसे अधिक अवसर तो इस विजातीय परिवारमें नहीं ही