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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२७८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

तो संयम सिद्ध करना――स्वाद जीतना ही था। अतएव मैं आहारकी वस्तुओंमें और उनके परिमाणमें फेरबदल करने लगा। किन्तु रस तो पीछा पकड़े हुए थे ही। मैं जिस वस्तुको छोड़ता और उसके बदले में जिसे लेता, उसमें से बिलकुल ही नये और अधिक रसोंका निर्माण हो जाता!

इन प्रयोगों में मेरे कुछ साथी भी थे। उनमें हरमान कैलेनबैंक[] मुख्य थे। चूँकि उनका परिचय मैं ‘दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहका इतिहास‘ में दे चुका हूँ, इसलिए पुनः इन प्रकरणोंमें देनेका विचार मैंने छोड़ दिया है। उन्होंने मेरे प्रत्येक उपवासमें, एकाशनमें और दूसरे परिवर्तनोंमें, मेरा साथ दिया था। जिन दिनों लड़ाई खूब जोरसे चल रही थी, उन दिनों तो मैं उन्हींके घरमें रहता था। हम दोनों अपने परिवर्तनोंकी चर्चा करते और नये परिवर्तनोंमेंसे पुराने स्वादों से अधिक स्वाद ग्रहण करते थे। उस समय तो ये संवाद मीठे भी मालूम होते थे। उनमें कोई अनौचित्य नहीं जान पड़ता था। किन्तु अनुभवने सिखाया कि स्वादोंकी चर्चाका ऐसा आनन्द लेना भी अनुचित था। मतलब यह कि मनुष्यको स्वादके लिए नहीं, बल्कि शरीरके निर्वाहके लिए ही खाना चाहिए। जब प्रत्येक इन्द्रिय केवल शरीरके लिए और शरीरके द्वारा आत्माके दर्शनके लिए ही काम करती है, तब उसके रस शून्यवत् हो जाते हैं और तभी कहा जा सकता है कि वह स्वाभाविक रूपसे बरतती है।

ऐसी स्वाभाविकता प्राप्त करनेके लिए जितने प्रयोग किये जायें उतने कम ही हैं, और ऐसा करते हुए अनेक शरीरोंकी आहुति देनी पड़े, तो उसे भी हमें तुच्छ समझना चाहिए। आज तो उलटी धारा बह रही है। नश्वर शरीरको सजानेके लिए, उसकी उम्र बढ़ाने के लिए हम अनेक प्राणियोंकी बलि देते हैं, फिर भी उससे शरीर और आत्मा दोनोंका हनन होता है। एक रोगको मिटानेकी कोशिशमें, इन्द्रियोंके भोगोंको भोगनेका यत्न करनेमें हम अनेक नये रोग उत्पन्न कर लेते हैं, और अन्तमें भोग भोगनेकी शक्ति भी खो बैठते हैं। और, अपनी आँखोंके सामने हो रही इस क्रियाको देखनेसे हम इनकार करते हैं।

आहारके जिन प्रयोगोंका वर्णन करनेमें मैं कुछ समय लेना चाहता हूँ, उन्हें पाठक समझ सकें इसलिए उनके उद्देश्यकी और उनके मूलमें काम कर रही विचारधाराकी जानकारी देना आवश्यक था।

२८. पत्नीकी दृढ़ता

कस्तूरबाईपर रोगके तीन घातक हमले[] हुए और तीनोंमें वह केवल घरेलू उपचारोंसे बच गई। उनमें पहली घटना उस समय घटी जब सत्याग्रहका युद्ध चल रहा था। उसे बार-बार रक्तस्राव हुआ करता था। एक डाक्टर मित्रने शस्त्रक्रिया करा लेनेकी सलाह दी थी। थोड़ी आनाकानीके बाद पत्नीने शस्त्रक्रिया कराना स्वीकार

  1. देखिए खण्ड २९, पृष्ठ १३६-३७।
  2. एक ऐसे अवसरपर गांधीजी जेलमें थे; उस अवसरपर उन्होंने बा को एक मार्मिक पत्र लिखा था। देखिए खण्ड ९, पृष्ठ १०९।