हम आखिर वहाँ बड़ी मेहनत के बाद कुछ जरूरी परिवर्तन करा सके थे। पर केवल संयमकी दृष्टिसे देखें, तो दोनों प्रतिबन्ध अच्छे ही थे। ऐसा प्रतिबन्ध जब जबरदस्ती लगाया जाता है, तो वह सफल नहीं होता। पर स्वेच्छासे पालन करनेपर ऐसा प्रतिबन्ध बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। अतएव जेलसे छूटने के बाद मैंने भोजनमें तुरन्त ये परिवर्तन किये। भरसक चाय पीना बन्द किया और शामको जल्दी खानेकी आदत डाली, जो आज स्वाभाविक हो गई है।
किन्तु एक ऐसी घटना घटी, जिसके कारण मैंने नमकका त्याग कर दिया, यह लगभग दस वर्षतक अखण्ड रूपसे कायम रहा। अन्नाहार-सम्बन्धी कुछ पुस्तकों में मैंने पढ़ा था कि मनुष्यके लिए नमक खाना आवश्यक नहीं है और न खानेवालेको आरोग्यकी दृष्टिसे लाभ ही होता है। यह तो मुझे सुझा ही था कि नमक न खानेसे ब्रह्मचारीको लाभ होता है। मैंने यह भी पढ़ा और अनुभव किया था कि कमजोर शरीरवालेको दाल न खानी चाहिए। किन्तु मैं उन्हें तुरन्त छोड़ न सका था। दोनों चीजें मुझे प्रिय थीं।
यद्यपि उक्त शस्त्रक्रियाके बाद कस्तुरबाईका रक्तस्राव थोड़े समय के लिए बन्द हो गया था, पर अब वह फिर शुरू हो गया और किसी प्रकार बन्द ही न होता था। अकेले पानीके उपचार व्यर्थ सिद्ध हुए। यद्यपि पत्नीको मेरे उपचारोंपर विशेष श्रद्धा नहीं थी, तथापि उनके लिए तिरस्कार भी नहीं था। दूसरी दवा करनेका आग्रह न था। मैंने उसे नमक और दाल छोड़नेके लिए मनाना शुरू किया। बहुत मनानेपर भी, अपने कथन के समर्थन में कुछ-न-कुछ पढ़कर सुनानेपर भी, वह मानी नहीं। आखिर उसने कहा: “दाल और नमक छोड़नेको तो कोई आपसे कहे, तो आप भी न छोड़ेंगे।” मुझे दुःख हुआ और हर्ष भी हुआ। मुझे अपना प्रेम उँडेलनेका अवसर मिला। उस हर्षमें मैंने तुरन्त ही कहा, “तुम्हारा यह ख्याल गलत है। मुझे बीमारी हो और वैद्य इस चीजको या दूसरी किसी चीजको छोड़नेके लिए कहे, तो मैं अवश्य छोड़ दूँ। लेकिन जाओ, मैंने तो एक सालके लिए दाल और नमक दोनों छोड़े। तुम छोड़ो या न छोड़ो, यह अलग बात है।”
पत्नीको बहुत पश्चात्ताप हुआ। वह कह उठी, “मुझे माफ कीजिए। आपका स्वभाव जानते हुए भी मैं कह गई। अब मैं दाल और नमक नहीं खाऊँगी, लेकिन आप अपनी बात लौटा लें। यह तो मेरे लिए बहुत बड़ी सजा हो जायेगी।”
मैंने कहा, “अगर तुम दाल और नमक छोड़ोगी, तो अच्छा ही होगा। मुझे विश्वास है कि उससे तुम्हें लाभ होगा। पर मैं ली हुई प्रतिज्ञा वापस नहीं ले सकूँगा। मुझे तो इससे लाभ ही होगा। मनुष्य किसी भी निमित्तसे संयम क्यों न पाले, उससे उसे लाभ ही है। अतएव तुम मुझसे आग्रह न करो। फिर मेरे लिए भी यह एक परीक्षा हो जायेगी और इन पदार्थोंको छोड़नेका जो निश्चय तुमने किया है, उसपर दृढ़ रहनेमें तुम्हें मदद मिलेगी। ”
इसके बाद मुझे उसे मनानेकी जरूरत तो रही ही नहीं। “आप बहुत हठी हैं। किसीकी बात मानते ही नहीं।” कहकर और अंजलि-भर आँसू बहाकर वह शान्त हो गई।