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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२८८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय


इस कल्पनामें बहुत-से दोष तो थे ही। नवयुवक मेरे पास जन्मसे नहीं रहे थे। सब अलग-अलग वातावरणमें पले थे। सब एक धर्मके भी नहीं थे। ऐसी स्थितिमें रहे हुए बालकों और बालिकाओंका पिता बनकर भी मैं उनके साथ न्याय कैसे कर सकता था?

किन्तु मैंने हृदयकी शिक्षाको अर्थात् चरित्रके विकासको हमेशा पहला स्थान दिया है। और, यह सोचकर कि उसका परिचय तो किसी भी उम्रमें और कितने ही प्रकारके वातावरणमें पले हुए बालकों और बालिकाओंका न्यूनाधिक प्रमाणमें कराया जा सकता है, इन बालकों और बालिकाओंके साथ मैं रात-दिन पिताकी तरह रहता था। मैंने चरित्रको उनकी शिक्षाकी बुनियाद माना था। यदि बुनियाद पक्की हो, तो अवसर मिलनेपर दूसरी बातें बालक मदद लेकर या अपनी ताकतसे खुद जान-समझ सकते हैं।

फिर भी मैं समझता था कि थोड़ा-बहुत अक्षर-ज्ञान तो कराना ही चाहिए, इसलिए कक्षाएँ शुरू कीं और इस कार्य में मैंने श्री कैलेनबैककी और प्रागजी देसाईकी सहायता ली। शारीरिक शिक्षाकी आवश्यकताको मैं समझता था। यह शिक्षा उन्हें सहज ही मिल रही थी। आश्रममें नौकर तो थे ही नहीं। पाखाना-सफाईसे लेकर रसोई बनाने तकके सारे काम आश्रमवासियोंको ही करने होते थे। वहाँ फलोंके पेड़ बहुत थे। नई फसलें भी बोनी थीं। श्री कैलेनबैकको खेतीका शौक था। वे स्वयं सरकारके आदर्श बगीचोंमें जाकर थोड़े समयतक तालीम ले आये थे। ऐसे छोटे-बड़े सबको, जो रसोईके काम में लगे न होते थे, रोज अमुक समयके लिए बगीचे में काम करना ही पड़ता था। इसमें बड़ा हिस्सा बालकोंका था। बड़े-बड़े गड्ढे खोदना, पेड़ काटना, बोझ उठाकर ले जाना आदि कामोंमें उनके शरीर अच्छी तरह कसे जाते थे। इसमें उन्हें आनन्द आता था, और इसलिए दूसरी कसरत या खेल-कूदकी उन्हें जरूरत न रहती थी। काम करनेमें कुछ विद्यार्थी अथवा कभी-कभी सब विद्यार्थी नखरे करते थे, आलस्य करते थे। अक्सर इन बातोंकी ओरसे मैं आँख मींच लेता था। कभी-कभी उनसे सख्ती से काम लेता था। मैं यह भी देखता था कि जब सख्ती करता था, तब उनका जी कामसे ऊब जाता था। फिर भी मुझे याद नहीं पड़ता कि बालकोंने सख्तीका कभी विरोध किया हो। जब-जब मैं सख्ती करता, तब-तब उन्हें समझाता और उन्हींसे कबूल कराता था कि कामके समय खेलनेकी आदत अच्छी नहीं मानी जा सकती। वे उस समय तो समझ जाते, पर दूसरे ही क्षण भूल भी जाते। इस तरह हमारी गाड़ी चलती थी। किन्तु उनके शरीर मजबूत बनते जा रहे थे। आश्रम में बीमारी मुश्किलसे ही आती थी। कहना चाहिए कि इसमें जलवायुका और अच्छे तथा नियमित आहारका भी बड़ा हाथ था।

शारीरिक शिक्षाके सिलसिले में ही शारीरिक धन्धेकी शिक्षाका भी मैं उल्लेख कर दूं। इरादा यह था कि सबको कोई-न-कोई उपयोगी धन्धा सिखाया जाये। इसके लिए श्री कैलेनबैंक ट्रेपिस्ट मठमें चप्पल बनाना सीख आये। उनसे मैंने सीखा और जो बालक इस धन्धेको सीखनेके लिए तैयार हुए उन्हें मैंने सिखाया। श्री कैलेनबैकको