बढ़ई कामका थोड़ा अनुभव था, और आश्रम में बढ़ईका काम जाननवाला एक साथी था, इसलिए यह काम भी कुछ हदतक बालकोंको सिखाया जाता था। रसोइयेका काम तो लगभग सभी बालक सीख गये थे।
बालकोंके लिए ये सारे काम नये थे। इन कामोंको सीखनेकी बात तो उन्होंने स्वप्न में भी न सोची होगी। हिन्दुस्तानी बालक दक्षिण आफ्रिकामें जो-कुछ भी शिक्षा पाते थे, वह केवल प्राथमिक किताबी-ज्ञानकी ही होती थी।
टॉल्स्टॉय आश्रममें शुरूसे ही यह रिवाज डाला गया था कि जिस कामको हम शिक्षक न करें, वह बालकोंसे न कराया जाये; और बालक जिस काममें लगे हों, उसमें उनके साथ उसी कामको करनेवाला एक शिक्षक हमेशा रहे। इसलिए बालकोंने जो कुछ सीखा, उमंगके साथ सीखा।
चरित्र और किताबो-ज्ञानके विषयमें इसके आगे लिखूँगा।
३३. पुस्तकीय-ज्ञान
पिछले प्रकरण में शारीरिक शिक्षण और उसके सिलसिले में थोड़ी दस्तकारी सिखानेका काम टॉल्स्टॉय आश्रम में किस प्रकार शुरू किया गया, इसे हम कुछ हद तक देख चुके हैं। यद्यपि यह काम मैं इस तरहसे तो कर ही न सका, जिससे मुझे सन्तोष हो, फिर भी उसमें थोड़ी-बहुत सफलता मिली थी।
पर पुस्तकीय ज्ञान देना कठिन मालूम हुआ। मेरे पास उसके लिए आवश्यक सामग्री न थी। स्वयं मुझे जितना मैं चाहता था उतना समय न था, न मुझमें उतनी योग्यता थी। दिन-भर शारीरिक काम करते-करते मैं थक जाता था और जिस समय थोड़ा आराम करनेकी जरूरत होती, उसी समय पढ़ाईके वर्ग लेने होते थे। अतएव मैं ताजा रहना तो दूर जैसे-तैसे जाग्रत रह पाता था। सुबहका समय खेतीमें और घरके काम में जाता था। इसलिए दुपहरको भोजनके बाद तुरन्त ही शालाका काम शुरू होता था। इसके सिवा दूसरा कोई भी समय अनुकूल न था।
पुस्तक-ज्ञानके लिए अधिक से-अधिक तीन घंटे रखे गये थे। कक्षामें हिन्दी, तमिल, गुजराती और उर्दू भाषाएँ सिखाई जाती थीं। प्रत्येक बालकको उसकी मातृभाषाके द्वारा ही शिक्षा देनेका आग्रह था। अंग्रेजी भी सबको सिखाई जाती थी। इसके अतिरिक्त गुजरात के हिन्दू बालकों को थोड़ा संस्कृत का और सब बालकोंको थोड़ा हिन्दीका परिचय कराया जाता था। इतिहास, भूगोल और अंकगणित सभीको सिखाना था। यही पाठ्यक्रम था।
तमिल और उर्दू सिखानेका काम मेरे जिम्मे था। तमिलका ज्ञान मैंने स्टीमरोंमें और जेल में प्राप्त किया था। इसमें भी मैं पोप[१]-कृत उत्तम पुस्तक ‘तमिल-स्वयं-शिक्षक’ से आगे नहीं बढ़ सका था। उर्दू लिपिका ज्ञान भी उतना ही था, जितना स्टीमरमें
- ↑ जॉर्ज उग्लो पोप-२ देखिए खण्ड ८ पृष्ठ १३१।