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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२९०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

हो पाया था। और, फारसी अरबीके खास-खास शब्दोंका उतना ही ज्ञान था, जितना मुसलमान मित्रोंके परिचयसे प्राप्त कर सका था! संस्कृत जितनी हाईस्कूलमें सीखा था उतनी ही जानता था। गुजरातीका ज्ञान भी उतना ही था, जितना शाला में मिला था।

इतनी पूँजीसे मुझे अपना काम चलाना था और इसमें मेरे जो सहायक थे, वे मुझसे भी कम जाननेवाले थे। परन्तु देशी भाषाओंके प्रति मेरे प्रेमने, अपनी शिक्षण-शक्तिके विषय में मेरी श्रद्धाने, विद्यार्थियोंके अज्ञानने और उससे भी अधिक उनकी उदारताने इस काम में मेरी सहायता की।

तमिल विद्यार्थियोंका जन्म दक्षिण आफ्रिकामें ही हुआ था, इसलिए वे तमिल बहुत कम जानते थे। लिपि तो उन्हें बिलकुल न आती थी। इसलिए मैं उन्हें लिपि तथा व्याकरणके मूल तत्त्व सिखाता था। यह सरल काम था। विद्यार्थी जानते थे कि तमिल बातचीत में तो वे मुझे आसानीसे हरा सकते थे और जब केवल तमिल जाननेवाले ही मुझसे मिलने आते, तब वे मेरे दुभाषिएका काम करते थे। मेरी गाड़ी चली, क्योंकि मैंने विद्यार्थियोंके सामने अपने अज्ञानको छिपानेका कभी प्रयत्न ही नहीं किया। हर बातमें जैसा मैं था वैसा ही वे मुझे जानने लगे थे। इसके कारण पुस्तक-ज्ञानकी भारी कमी रहते हुए भी मैं उनके प्रेम और आदरसे कभी वंचित न रहा। मुसलमान बालकोंको उर्दू सिखाना अपेक्षाकृत अधिक सरल था। वे लिपि जानते थे। मेरा काम उनमें वाचनकी रुचि बढ़ाने और उनके अक्षर सुधारनेका ही था।

मुख्यतः आश्रमके ये सब बालक निरक्षर थे और पाठशाला में कहीं पढ़े हुए न थे। मैंने सिखाते-सिखाते देखा कि मुझे उन्हें सिखाना तो कम ही है। ज्यादा काम तो उनका आलस्य छुड़ाने, उनमें स्वयं पढ़नेकी रुचि जगाने और उनकी पढ़ाई पर निगरानी रखनेका ही था। मुझे इतने कामसे सन्तोष रहता था। यही कारण है कि अलग-अलग उम्रके और अलग-अलग विषयोंवाले विद्यार्थियोंको एक ही कमरेमें बैठाकर मैं उनसे काम ले सकता था।

पाठ्य-पुस्तकोंकी जो पुकार जब-तब सुनाई पड़ती है, उसकी आवश्यकता मुझे कभी मालूम न हुई। मुझे याद नहीं पड़ता कि जो पुस्तकें हमारे पास थीं उनका भी बहुत उपयोग किया गया हो। हरएक बालकको बहुत-सी पुस्तकें दिलानेकी मैंने जरूरत नहीं देखी। मेरा ख्याल है कि शिक्षक ही विद्यार्थीकी पाठ्यपुस्तक है। शिक्षकोंने पुस्तकोंकी मदद से मुझे जो सिखाया था, वह मुझे बहुत ही कम याद रहा है। उन्होंने अपने मुंहसे जो सिखाया था, उसका स्मरण आज भी बना हुआ है।

बालक आँखोंसे जितना ग्रहण करते हैं, उसकी अपेक्षा कानोंसे सुनी हुई बातको वे थोड़े परिश्रम से और बहुत अधिक मात्रामें ग्रहण कर सकते हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि मैं बालकोंको एक भी पुस्तक पूरी पढ़ा पाया था। पर अनेकानेक पुस्तकों में से जितना कुछ मैं पचा पाया था उसे मैंने अपनी भाषामें उनके सामने रखा था। मैं मानता हूँ कि वह उन्हें आज भी याद होगा। पढ़ाया हुआ याद रखने में उन्हें कष्ट होता था, जब कि मेरी कही हुई बातको वे उसी समय मुझे फिर सुना देते थे ।