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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२९३

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

३५. भले-बुरेका मिश्रण

टॉल्स्टॉय आश्रम में श्री कैलेनबैकने मेरे सामने एक प्रश्न खड़ा किया। इससे पूर्व मैंने उसपर कभी विचार ही नहीं किया था। आश्रममें कुछ लड़के बहुत ऊधमी और दुष्ट स्वभाव के थे। कुछ आवारा थे। मेरे तीन लड़के भी उन्हींके साथ रहते थे। उस तरह पले हुए दूसरे भी बालक थे। लेकिन श्री कैलेनबैंकका ध्यान तो इस ओर ही था कि वे आवारा युवक और मेरे लड़के एक-साथ कैसे रह सकते हैं।

एक दिन वे बोले: “आपका यह तरीका मुझे जरा भी नहीं जँचता। इन लड़कोंके साथ आप अपने लड़कोंको रखें, तो उसका एक ही परिणाम आ सकता है और वह यह कि इन आवारा लड़कोंकी छूत उन्हें लगे। इससे वे बिगड़ेंगे नहीं तो और क्या होगा?”

मुझे इस समय यह तो याद नहीं है कि मैं क्षण-भर सोचमें पड़ा था या नहीं, पर अपना जवाब मुझे याद है। मैंने कहा था:

“अपने लड़कों और इन आवारा लड़कोंके बीच मैं भेद कैसे कर सकता हूँ? इस समय तो मैं दोनों के लिए समान रूपसे जिम्मेदार हूँ। ये नौजवान मेरे बुलाये यहाँ आये हैं। यदि मैं इन्हें पैसे दे दूं, तो ये आज ही जोहानिसबर्ग जाकर वहाँ पहले की तरह फिर रहने लग जायें। यदि ये और इनके माता-पिता यह मानते हों कि यहाँ आकर इन्होंने मुझपर मेहरबानी की है तो इसमें आश्चर्य नहीं। यहाँ आने से इन्हें कष्ट उठाना पड़ रहा है, यह तो आप और मैं दोनों देख रहे हैं। पर मेरा धर्म स्पष्ट है। मुझे इन्हें यहीं रखना चाहिए। अतएव मेरे लड़के भी इनके साथ रहेंगे। इसके सिवा, क्या मैं आजसे अपने लड़कोंको यह भेदभाव सिखाऊँ कि वे दूसरे कुछ लड़कों की अपेक्षा ऊँचे हैं? उनके दिमागमें इस प्रकारके विचारको ठूंसना ही उन्हें गलत रास्ते ले जाने-जैसा है। आजकी स्थितिमें रहने से वे ठीक गढ़े जायेंगे, अपने सारासारकी परीक्षा करने लगेंगे। हम यह क्यों न मानें कि यदि मेरे लड़कोंमें सचमुच कोई गुण हैं, तो उलटे उन्हींकी छूत उनके साथियोंको लगेगी? कुछ भी हो, मुझे तो उन्हें यहीं रखना होगा। और यदि ऐसा करनेमें कोई खतरा हो भी, तो उसे उठाना होगा।”

श्री कैलेनबैकने सिर हिलाया।

यह नहीं कहा जा सकता कि इस प्रयोगका परिणाम बुरा निकला। मैं यह नहीं मानता कि उससे मेरे लड़कोंका कोई नुकसान हुआ। उलटे, मैं यह देख सका कि उन्हें लाभ हुआ है। उनमें बड़प्पनका कोई अंश रहा हो, तो वह पूरी तरह निकल गया। वे सबके साथ घुलना-मिलना सीखे। उनकी कसौटी हुई।

इस और ऐसे दूसरे अनुभवों परसे मेरा यह विचार बना है कि माता-पिताकी उचित देख-रेख हो, तो भले और बुरे लड़कोंके साथ रहने और पढ़नेसे भलोंकी कोई हानि नहीं होती।

इसका कोई निश्चय तो है ही नहीं कि अपने लड़कोंको तिजोरीमें बन्द रखनेसे वे शुद्ध रहते हैं और बाहर निकालनेसे भ्रष्ट हो जाते हैं। हाँ, यह सच है कि जहाँ