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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/२९७

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

करके मैं पर्याप्त खाने और खाये हुएको हजम करनेका प्रयत्न करता था। लेकिन इन दिनों मेरे पैरोंकी पिंडलियों में ज्यादा दर्द रहने लगा। विलायत पहुँचनेके बाद भी मेरी पीड़ा कम न हुई, बल्कि बढ़ गई। विलायतमें डा० जीवराज मेहतासे पहचान हो गई थी। उन्हें अपने उपवास और पिंडलियोंकी पीड़ाका इतिहास सुनानेपर उन्होंने कहा, “यदि आप कुछ दिनके लिए पूरा आराम न करेंगे, तो सदाके लिए पैरोंके बेकार हो जानेका डर है।”

इसी समय मुझे पता चला कि लम्बे उपवास करनेवालेको जल्दी ही खोई हुई ताकत प्राप्त करने या बहुत खानेका लोभ कभी न करना चाहिए। उपवास करनेकी अपेक्षा उपवास छोड़ने में अधिक सावधान रहना पड़ता है, और शायद उसमें संयम भी अधिक रखना पड़ता है।

मदीरा में हमें समाचार मिले कि महायुद्ध छिड़ने में बहुत देर नहीं है। इंग्लैंडकी खाड़ी में पहुँचते ही हमें लड़ाई छिड़ जानेके समाचार मिले और हमें रोक दिया गया। समुद्र में जगह-जगह सुरंगें बिछा दी गई थीं। उनसे बचाकर हमें साउथम्पटन पहुँचाने में एक-दो दिनकी देर हो गई।

४ अगस्तको युद्ध घोषित किया गया था और हम ६ अगस्तको विलायत पहुँचे थे।

 

३८. लड़ाई में हिस्सा

विलायत पहुँचनेपर पता चला कि गोखले तो पेरिसमें अटक गये हैं, पेरिसके साथ यातायातका सम्बन्ध टूट गया है और कहना मुश्किल है कि वे कबतक आयेंगे। गोवले अपने स्वास्थ्यके कारण फ्रांस गये थे, परन्तु लड़ाईकी वजह से वहाँ फँस गये। उनसे मिले बिना मुझे देश नहीं जाना था, और कोई कह नहीं सकता था कि वे कब आ सकेंगे।

इस बीच क्या किया जाये? लड़ाईके बारेमें मेरा धर्म क्या है? जेलके मेरे साथी और सत्याग्रही सोराबजी अडाजानिया विलायत में ही बैरिस्टरीका अभ्यास करते थे। अच्छेसे- अच्छे सत्याग्रहीके नाते सोराबजीको बैरिस्टरीकी शिक्षा प्राप्त करनेके लिए इंग्लैंड भेजा गया था। ख्याल यह था कि वहाँसे लौटनेपर वे दक्षिण आफ्रिकामें मेरी जगह काम करेंगे। उनका खर्च डा० प्राणजीवनदास मेहता देते थे। उनसे और उनके द्वारा डा० जीवराज मेहता इत्यादि जो लोग विलायतमें पढ़ रहे थे, उनसे मैंने विचार-विमर्श किया। विलायत में रहनेवाले हिन्दुस्तानियोंकी एक सभा बुलाई और उसके सामने मैंने अपने विचार रखे।

मुझे लगा कि विलायतमें रहनेवाले हिन्दुस्तानियोंको लड़ाईमें अपना हिस्सा अदा करना चाहिए। अंग्रेज विद्यार्थियोंने लड़ाईमें सेवा करनेका अपना निश्चय घोषित किया था। हिन्दुस्तानियोंको भी इतना तो करना ही चाहिए था। इन दलीलोंके विरोध में इस सभा में बहुत दलीलें दी गई। यह कहा गया कि हमारी और अंग्रेजोंकी स्थितिके