माना; और आज भी इस प्रश्नपर सोचता हूँ, तो मुझे उपर्युक्त विचारधारामें कोई दोष नजर नहीं आता। ब्रिटिश साम्राज्य के विषय में उस समय मेरे जो विचार थे, उनके अनुसार मैंने युद्धकार्य में हिस्सा लिया था। अतएव मुझे उसका पश्चात्ताप भी नहीं हैं।
मैं जानता हूँ कि अपने उपर्युक्त विचारोंका औचित्य मैं उस समय भी सब मित्रोंके सामने सिद्ध नहीं कर सका था। प्रश्न सूक्ष्म है। उसमें मतभेदकी गुंजाइश है। इसीलिए अहिंसा-धर्म के माननेवालों और सूक्ष्म रीतिसे उसका पालन करनेवालोंके सम्मुख यथासम्भव स्पष्टतासे मैंने अपनी राय प्रकट की है। सत्यका आग्रही रूढ़िसे चिपटकर ही कोई काम न करे। वह अपने विचारोंपर हठपूर्वक डटा न रहे, हमेशा यह मानकर चले कि उनमें दोष हो सकता है, और जब दोषका ज्ञान हो जाये, तब भारीसे-भारी जोखिमोंको उठाकर भी उसे स्वीकार करे और प्रायश्चित्त भी करे।
४०. छोटा-सा सत्याग्रह
इस प्रकार धर्म समझकर मैं युद्धमें सम्मिलित तो हुआ। पर मेरे नसीबमें उसमें सोधे हाथ बँटाना नहीं आया, इतना ही नहीं बल्कि ऐसे नाजुक समयमें सत्याग्रह करनेकी भी नौबत आ गई।
मैं लिख चुका हूँ कि जब हमारे नाम मंजूर हुए और रजिस्टर में दर्ज किये गये, तो हमें पूरी कवायद सिखानेके लिए एक अधिकारी[१] नियुक्त किया गया। हम सबका ख्याल यह था कि ये अधिकारी युद्धकी तालीम देनेके लिए हमारे मुखिया थे, बाकी सब मामलोंमें दलका मुखिया मैं था। मैं अपने साथियोंके प्रति जिम्मेदार था और साथी मेरे प्रति; अर्थात् हमारा ख्याल यह था कि अधिकारीको सारा काम मेरे द्वारा लेना चाहिए। पर पूतके पाँव पालने में नजर आते हैं; पहले ही दिनसे हमें उस अधिकारीकी दृष्टि कुछ और ही मालूम हुई।
सोराबजी बड़े होशियार थे। उन्होंने मुझे सावधान किया: “भाई, ध्यान रखिए। ऐसा प्रतीत होता है कि ये सज्जन यहाँ अपनी जहाँगीरी चलाना चाहते हैं। हमें उनके हुक्मकी जरूरत नहीं। हम उन्हें शिक्षक मानते हैं। पर मैं तो देखता हूँ कि ये जो नौजवान आये हैं, वे मानो हमपर हुक्म चलाने आये हैं।”
ये नौजवान आक्सफोर्डके विद्यार्थी थे और हमें सिखानेके लिए आये थे। बड़े अधिकारीने उन्हें हमारे नायब-अधिकारीके रूपमें नियुक्त कर दिया था।
मैं भी सोराबजीकी कही बात देख चुका था। मैंने सोराबजीको सान्त्वना दी और निश्चिन्त रहने को कहा। पर सोराबजी एकाएक माननेवाले आदमी नहीं थे।
उन्होंने हँसते हुए कहा, “आप भोले हैं। ये लोग मीठी-मीठी बातें करके आपको ठगेंगे और फिर जब आपकी आँख खुलेगी तब आप कहेंगे: “चलो, सत्याग्रह करें। और फिर आप हमें मुसीबत में डालेंगे।”
- ↑ कर्नल आर० जे० बेकर।