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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३०४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

टुकड़ी के रूपमें जायें। नेटली अस्पतालमें तो टुकड़ीको वहाँके मुखियाके अधीन रहना होगा, इसलिए उसकी मानहानि नहीं होगी। सरकारको उनके जानेसे सन्तोष होगा और भारी संख्यामें आये हुए घायलोंकी सेवा-शुश्रूषा होगी। मेरे साथियोंको और मुझे यह सलाह पसन्द आई और बचे हुए विद्यार्थी भी नेटली ही गये।

अकेला मैं ही बिछौनेपर हाथ मलता पड़ा रहा।

४१. गोखलेकी उदारता

विलायत में मुझे पसलीकी सूजनकी जो शिकायत हुई थी, उसकी बात मैं कर चुका हूँ। इस बीमारी के समय गोखले विलायत आ चुके थे। उनके पास मैं और कैलेनबैंक हमेशा जाया करते थे। अधिकतर लड़ाईकी ही चर्चा होती थी। कैलेनबैकको जर्मनीका भूगोल कण्ठाग्र था और उन्होंने यूरोपकी यात्रा भी खूब की थी। इससे वे गोखलेको नक्शा खींचकर लड़ाईके मुख्य स्थान बताया करते थे।

जब मैं बीमार पड़ा, तो मेरी बीमारीकी भी चर्चाका एक विषय बन गई। आहारके मेरे प्रयोग तो चल ही रहे थे। उस समयका मेरा आहार मूँगफली, कच्चे और पके केले, नींबू, जैतून का तेल, टमाटर और अंगूर आदि था। दूध, अनाज, दाल आदि मैं बिलकुल न लेता था।

डा॰ जीवराज मेहता मेरी सार-सँभाल करते थे। उन्होंने दूध और अन्न लेनेका बहुत आग्रह किया। शिकायत गोखलेतक पहुँची। फलाहारकी मेरी दलीलके बारेमें उन्हें बहुत आदर न था; उनका आग्रह यह था कि आरोग्यकी रक्षाके लिए डाक्टर जो कहें, सो लेना चाहिए।

गोखलेके आग्रहको ठुकराना मेरे लिए बहुत ही कठिन था। जब उन्होंने खूब आग्रह किया, तो मैंने विचारके लिए चौबीस घंटोंका समय माँगा। कैलेनबैक और मैं दोनों घर आये। मार्ग में अपने धर्मके विषय में मैंने उनसे चर्चा की। मेरे प्रयोग में वे साथ थे। उन्हें प्रयोग अच्छा लगता था। पर अपनी तबीयत के लिए मैं उसे छोड़ूँ तो ठीक हो, ऐसी उनकी भी भावना मुझे मालूम हुई। इसलिए अब मुझे स्वयं ही अन्तर्नाद की टोह लेनी थी।

सारी रात मैंने सोच-विचार में बिताई। यदि समूचे प्रयोगको छोड़ देता, तो ्मेरे किये हुए समस्त विचार मिट्टी में मिल जाते। उन विचारोंमें मुझे कहीं भी भूल नहीं दिखाई देती थी। प्रश्न यह था कि कहाँ तक गोखलेके प्रेमका बन्धन मानना मेरा धर्म था, अथवा किस हदतक शरीर-रक्षाके लिए ऐसे प्रयोगोंको छोड़ना ठीक था। इसलिए मैंने निश्चय किया कि इन प्रयोगों में से जो प्रयोग केवल धर्मकी दृष्टिसे चल रहा है, उसपर दृढ़ रहकर दूसरे सब मामलोंमें डाक्टरके कहे अनुसार चलना चाहिए। दूधके त्याग में धर्म-भावनाका स्थान मुख्य था। कलकत्ते में गाय-भैंसोंपर होने-वाली क्रूर क्रियाएँ मेरे सामने मूर्तिमन्त थीं। मांसकी तरह पशुका दूध भी मनुष्यका आहार नहीं है, यह बात भी मेरे सामने थी। इसलिए दूधके त्यागपर डटे रहनेका