निश्चय करके मैं सवेरे उठा। इतने निश्चयसे मेरा मन बहुत हलका हो गया। गोखलेका डर था, पर मुझे यह विश्वास था कि वे मेरे निश्चयका आदर करेंगे।
शामको नेशनल लिबरल क्लबमें हम उनसे मिलने गये। उन्होंने तुरन्त ही प्रश्न किया: “क्यों डाक्टरका कहना माननेका निश्चय कर लिया न?”
मैंने धीरजसे जवाब दिया: “मैं सब कुछ करूँगा, किन्तु आप एक चीजका आग्रह न कीजिए। मैं दूध और दूधके पदार्थ अथवा मांस नहीं लूँगा। उन्हें न लेनेसे देहपात होता हो, तो वैसा होने देनेमें मुझे धर्म मालूम होता है।”
गोखलेने पूछा, “यह आपका अन्तिम निर्णय है?”
मैंने जवाब दिया, “मेरा खयाल है कि मैं दूसरा जवाब नहीं दे सकता। मैं जानता हूँ कि इससे आपको दुःख होगा, पर मुझे क्षमा कीजिए।”
गोखलेने कुछ दुःखसे परन्तु अत्यन्त प्रेमसे कहा: “आपका निश्चय मुझे पसन्द नहीं है। इसमें मैं धर्म नहीं देखता। पर अब मैं आग्रह नहीं करूँगा।” यह कहकर वे डॉ॰ जीवराज मेहताकी ओर मुड़े और उनसे बोले, “अब गांधीको तंग मत कीजिए। उनकी बताई हुई मर्यादामें उन्हें जो दिया जा सके, दीजिए।”
डाक्टरने अप्रसन्नता प्रकट की, लेकिन वे लाचार हो गये। उन्होंने मुझे मूँगका पानी लेने की सलाह दी, और उसमें हींगका बघार देने को कहा। मैंने इसे स्वीकार कर लिया। एक-दो दिन वह खुराक ली। उससे मेरी तकलीफ बढ़ गई। मुझे वह मुआफिक नहीं आई। अतएव मैं फिर फलाहार पर आ गया। डाक्टरने बाहरी उपचार तो किये ही। उससे थोड़ा आराम मिलता था। पर मेरी मर्यादाओंसे वे बहुत ही परेशान थे।
इस बीच लन्दनका अक्तूबर-नवम्बरका कुहरा सहन न कर सकनेके कारण गोखले हिन्दुस्तान जानेको रवाना हो गये।
४२. दर्द के लिए क्या किया?
पसलका दर्द मिट नहीं रहा था, इससे मैं घबराया। मैं इतना जानता था कि औषधोपचारसे नहीं, बल्कि आहारके परिवर्तनसे और थोड़े बाहरी उपचारसे दर्द जाना ही चाहिए।
सन् १८९० में मैं डाक्टर एलिन्सनसे मिला था। वे अन्नाहारी थे और आहारके परिवर्तन द्वारा बीमारियोंका इलाज करते थे। मैंने उन्हें बुलाया। वे आये। उन्हें शरीर दिखाया और दूधके बारेमें अपनी आपत्तिकी बात उनसे कही। उन्होंने मुझे तुरन्त आश्वस्त किया और कहा: “दूधकी कोई आवश्यकता नहीं है। और मुझे तो तुम्हें कुछ दिनों बिना किसी चिकनाईके ही रखना है।” यों कहकर पहले तो मुझे सिर्फ रूखी रोटी और कच्चे साग तथा फल खानेकी सलाह दी। कच्ची तरकारियोंमें मूली, प्याज और इसी तरहके दूसरे कन्द तथा हरी तरकारियाँ और फलोंमें मुख्यत: नारंगी लेनेको कहा। इन तरकारियोंको कद्दूकस पर कसकर या चटनीकी शक्लमें पीसकर खाना था।