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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३०६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मैंने इस तरह तीन दिन काम चलाया। पर कच्चे साग मुझे बहुत अनुकूल नहीं आये। मेरा शरीर इस योग्य नहीं था कि इस प्रयोगकी पूरी परीक्षा कर सकूँ, और न वैसी मुझमें श्रद्धा थी।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने चौबीसों घंटे खिड़कियाँ खुली रखने, रोज कुनकुने पानीसे नहाने, दर्दवाले हिस्से पर तेलकी मालिश करने और पावसे लेकर आधे घंटे तक खुली हवामें घूमने की सलाह दी। यह सब मुझे अच्छा लगा।

घरमें फ्रांसीसी ढंगकी खिड़कियाँ थीं। उन्हें पूरा खोल देने पर बरसातका पानी अन्दर आता था। ऊपरका रोशनदान खुलने लायक नहीं था। अतएव उसका पूरा शीशा तुड़वाकर उससे चौबीसों घंटे हवा आनेका सुभीता कर लिया। फ्रांसीसी खिड़कियाँ मैं इतनी खुली रखता था कि पानीकी बौछार अन्दर न आये।

यह सब करनेसे तबीयत कुछ सुधरी। बिलकुल अच्छी तो नहीं ही हुई।

कभी-कभी लेडी सिसिलिया रॉबर्ट्स मुझे देखने आती थीं। उनसे अच्छी जान-पहचान थी। उनकी मुझे दूध पिलानेकी प्रबल इच्छा थी। दूध मैं लेता न था। इसलिए उन्होंने दूधके गुणवाले पदार्थोंकी खोज शुरू की। उनके किसी मित्रने उन्हें ‘माल्टेड मिल्क’ बताया और अनजानमें कह दिया कि इसमें दूधका स्पर्श तक नहीं होता, यह तो रासायनिक प्रयोगसे तैयार किया हुआ दूधके गुणवाला चूर्ण है। मैं जान चुका था कि लेडी रॉबर्ट्सको मेरी धर्म-भावनाके प्रति बड़ा आदर था। अतएव मैंने उस चूर्णको पानी में मिलाकर पिया। मुझे उसमें दूधके समान ही स्वाद आया। मैंने ‘पानी पीकर जात पूछने’ जैसा काम किया।बोतल पर लगे परचेको पढ़नेसे पता चला कि यह तो दूधका ही पदार्थ है। अतएव एक ही बार पीनेके बाद उसे छोड़ देना पड़ा।

लेडी रॉबर्ट्सको खबर भेजी और लिखा कि वे तनिक भी चिन्ता न करें। वे तुरन्त मेरे घर आईं। उन्होंने खेद प्रकट किया। उनके मित्रने बोतल पर चिपका कागज पढ़ा नहीं था। मैंने इस भली बहनको आश्वासन दिया और इस बातके लिए उनसे माफी माँगी कि उनके द्वारा कष्टपूर्वक प्राप्त की हुई वस्तुका मैं उपयोग न कर सका। मैंने उन्हें यह भी जता दिया कि जो चूर्ण अनजानमें ले लिया है उसका मुझे कोई पछतावा नहीं है, न उसके लिए प्रायश्चित्तकी ही आवश्यकता है।

लेडी रॉबर्टसके साथके जो दूसरे मधुर स्मरण हैं उन्हें मैं छोड़ देना चाहता हूँ। ऐसे कई मित्रोंका मुझे स्मरण है, जिनका अनेक विपत्तियों और विरोधोंमें मुझे महान् आश्रय मिला है। ऐसे मीठे स्मरणों द्वारा श्रद्धालु यह अनुभव करता है कि ईश्वर दुःखरूपी कड़वी दवाएँ देता है, तो उसके साथ ही मैत्रीके मीठे अनुपान भी अवश्य देता है।

डा॰ एलिन्सन जब दूसरी बार मुझे देखने आये, तो उन्होंने अधिक स्वतन्त्रता दी और चिकनाईके लिए सूखे मेवेका अर्थात् मूँगफली आदिकी गिरीका मक्खन अथवा जैतूनका तेल लेनेको कहा। कच्चे साग अच्छे न लगें, तो उन्हें पकाकर भातके साथ खानेको कहा। यह सुधार मुझे अधिक अनुकूल पड़ा। पर पीड़ा पूरी तरह नष्ट न हुई। सावधानीकी आवश्यकता तो थी ही। मैं खटिया न छोड़ सका।