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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३१०

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

नहीं डालेगा। मैं तो यह जोखिम उठानेको कभी तैयार न होऊँगा। मुकदमा फिरसे चलाना पड़े, तो मुवक्किलको कितने खर्चमें उतरना होगा, और कौन कह सकता है कि अन्तिम परिणाम क्या होगा?”

इस बातचीत के समय मुवक्किल उपस्थित थे।

मैंने कहा, “मेरा तो खयाल है कि मुवक्किलको और हम दोनोंको ऐसी जोखिमें उठानी ही चाहिए। हमारे स्वीकार न करनेपर भी अदालत भूल-भरे फैसलेको भूल मालूम होनेपर बहाल रखेगी, इसका क्या भरोसा है? और भूल सुधारनेकी कोशिश में मुवक्किलको नुकसान उठाना पड़े, तो क्या हर्ज होगा?”

बड़े वकीलने कहा, “लेकिन हम भूल कबूल करें तब न?”

मैंने जवाब दिया, “हमारे भूल न स्वीकार करनेपर भी अदालत उस भूलको नहीं पकड़ेगी अथवा विरोधी पक्ष उसका पता नहीं लगायेगा, इसका भी क्या भरोसा है?”

बड़े वकीलने दृढ़तापूर्वक कहा, “तो इस मुकदमे में आप बहस करेंगे? भूल कबूल करनेकी शर्तपर मैं उसमें हाजिर रहनेको तैयार नहीं हूँ।’

मैंने नम्रतापूर्वक कहा, “यदि आप न खड़े हों और मुवक्किल चाहें, तो मैं खड़ा होने को तैयार हूँ। यदि भूल कबूल न की जाये, तो मैं मानता हूँ कि इस मुकदमे में काम करना मेरे लिए असम्भव होगा।”

इतना कहकर मैंने मुवक्किलकी तरफ देखा l। मुवक्किल थोड़े परेशान हुए। मैं तो मुकदमे में शुरू से ही था। मुवक्किलका मुझपर पूरा विश्वास था। वे मेरे स्वभावसे भी पूरी तरह परिचित थे। उन्होंने कहा: “ठीक है, तो आप ही अदालत में पैरवी कीजिए। भूल कबूल कर लीजिए। भाग्य में हारना होगा, तो हार जायेंगे। सच्चेका रखवाला राम तो है ही न?”

मुझे खुशी हुई। मैंने दूसरे जवाबकी आशा ही न रखी थी। बड़े वकीलने मुझे फिर चेताया। उन्हें मेरे ‘हठ‘ के लिए मुझपर तरस आया, लेकिन उन्होंने मुझे धन्यवाद भी दिया।

अदालत में क्या हुआ, इसकी चर्चा आगे होगी।

 

४५. चालाकी?

अपनी सलाहके औचित्यके विषय में मुझे लेशमात्र भी शंका न थी, पर उस मुकदमेकी पूरी पैरवी करनेकी अपनी योग्यताके सम्बन्धमें काफी शंका थी। ऐसी जोखिमवाले मामलेमें बड़ी अदालत में मेरा बहस करना मुझे बहुत जोखिम-भरा जान पड़ा। अतएव मनमें काँपते-काँपते मैं न्यायाधीशोंके सामने उपस्थित हुआ।

ज्यों ही उक्त भूलकी बात निकली कि एक न्यायाधीश बोल उठे:

“यह चालाकी नहीं कहलायेगी?”

मुझे बड़ा गुस्सा आया। जहाँ चालाकीकी गन्ध तक नहीं थी, वहाँ चालाकीका शक होना मुझे असह्य प्रतीत हुआ।