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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३१२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

४६. मुवक्किल साथी बन गये

नेटाल और ट्रान्सवालकी वकालत में यह भेद था कि नेटालमें एडवोकेट और अटर्नी में भेद होने पर भी दोनों सब अदालतों में समान रूपसे वकालत कर सकते थे, जब कि ट्रान्सवालमें बम्बईकी तरह एडवोकेट मुवक्किलके साथका सारा व्यवहार अटर्नीकी मारफत ही कर सकता है। बैरिस्टर बननेके बाद आप एडवोकेट अथवा अटर्नी दोमें से किसी एककी सनद ले सकते हैं और फिर वहीं धन्धा कर सकते हैं। नेटालमें मैंने एडवोकेटको सनद ली थी, ट्रान्सवालमें अटर्नीकी। एडवोकेटके नाते मैं वहाँ हिन्दुस्तानियोंके सीधे सम्पर्क में न आ सकता था और दक्षिण आफ्रिकामें वातावरण ऐसा नहीं था कि गोरे अटर्नी मुझे मुकदमे देते।

यों ट्रान्सवालमें वकालत करते हुए मजिस्ट्रेटके इजलासमें जानेके तो बहुत बार अवसर आते थे। एक प्रसंग ऐसा आया जब चलते हुए मुकदमेके दौरान मैंने देखा कि मेरे मुवक्किलने मुझे ठग लिया है। उसका मुकदमा झूठा था। वह कठघरे में खड़ा इस तरह काँप रहा था, मानो अभी गिर पड़ेगा। अतएव मैंने मजिस्ट्रेटको मुवक्किलके विरुद्ध फैसला देने को कहा और मैं बैठ गया। प्रतिपक्षीका वकील आश्चर्यचकित हो गया। मजिस्ट्रेट खुश हुआ। मुवक्किलको मैंने उलाहना दिया। वह जानता था कि मैं झूठे मुकदमे नहीं लेता था। उसने यह बात स्वीकार की और मैं मानता हूँ कि मैंने उसके खिलाफ फैसला माँगा, इसके लिए वह गुस्सा न हुआ। जो भी हो, पर मेरे इस बरतावका कोई बुरा प्रभाव मेरे धन्धे पर नहीं पड़ा और अदालतमें मेरा काम सरल हो गया। मैंने यह भी देखा कि सत्यकी मेरी इस पूजासे वकील बन्धुओंमें भी मेरी प्रतिष्ठा बढ़ गई थी, और विचित्र परिस्थितियोंके रहते हुए भी मुझे उनमें से कुछका स्नेह प्राप्त हो गया था।

वकालत करते हुए मैंने एक ऐसी आदत भी डाली थी कि अपना अज्ञान न मैं मुवक्किलोंसे छिपाता था और न वकीलोंसे। जहाँ-जहाँ मुझे कुछ सूझ न पड़ता, वहाँ-वहाँ मैं मुवक्किलसे दूसरे वकीलके पास जानेको कहता; अथवा यदि वह मुझे वकील करता, तो मैं उससे कहता कि अपनेसे अधिक अनुभवी वकीलकी सलाह लेकर मैं उसका काम करूँगा। अपने इस शुद्ध व्यवहारके कारण मैं मुवक्किलोंका अटूट प्रेम और विश्वास सम्पादन कर पाया था। बड़े वकीलके पास जानेकी जो फीस देनी पड़ती, उसके पैसे भी वे प्रसन्नतापूर्वक देते थे। इस विश्वास और प्रेमका पूरा-पूरा लाभ मुझे अपने सार्वजनिक काममें मिला।

पिछले प्रकरणों में मैं बता चुका हूँ कि दक्षिण आफ्रिकामें वकालत करनेका मेरा हेतु केवल लोकसेवा करना था। इस सेवा के लिए भी मुझे लोगोंका विश्वास सम्पादन करनेकी आवश्यकता थी। उदार दिल हिन्दुस्तानियोंने पैसे लेकर की गई वकालतको भी मेरी सेवा माना और जब मैंने उन्हें अपने हकोंके लिए जेलके दुःख सहनेकी सलाह दी, तब उनमें से बहुतोंने उस सलाहको ज्ञानपूर्वक स्वीकार करनेकी अपेक्षा मेरे प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेमके कारण ही स्वीकार किया था।