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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३१४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मैंने धीरेसे जवाब दिया, “आपने अपराध तो सरकारका किया है, और स्वीकार मेरे सामने करते हैं। इससे क्या होता है?”

पारसी रुस्तमजीने कहा, “अन्तमें मुझे करना तो वही है, जो आप कहेंगे। पर ... मेरे पुराने वकील हैं। उनकी सलाह तो आप लेंगे न? वे मेरे मित्र भी हैं।”

जाँच से पता चला कि चोरी लम्बे अरसेसे चल रही थी। जो चोरी पकड़ी गई वह तो थोड़ी ही थी। हम लोग पुराने वकीलके पास गये। उन्होंने केसकी जाँच की और कहा: “यह मामला जूरीके सामने जायेगा। यहाँके जूरी हिन्दुस्तानीको क्यों छोड़ने लगे? पर मैं आशा कभी न छोडूँगा।”

इन वकीलसे मेरा गाढ़ परिचय नहीं था। पारसी रुस्तमजीने ही जवाब दिया: “मैं आपका आभार मानता हूँ, किन्तु इस मामले में मुझे श्री गांधीकी सलाहके अनुसार चलना है। वे मुझे अधिक पहचानते हैं। आप इन्हें जो सलाह देना उचित समझें, देते रहिएगा।”

इस प्रश्नको यों निबटाकर हम रुस्तमजी सेठकी दुकान पर पहुँचे।

मैंने उन्हें समझाया: “मैं इस मामलेको अदालतमें जाने लायक नहीं मानता। मुकदमा चलाना न चलाना चुंगी-अधिकारीके हाथमें है। उसे भी सरकारके मुख्य वकीलकी सलाह के अनुसार चलना पड़ेगा। मैं दोनोंसे मिलनेको तैयार हूँ, पर मुझे तो उनके सामने उस चोरीको भी स्वीकार करना पड़ेगा, जिसे वे नहीं जानते। मैं सोचता हूँ कि जो दण्ड वे ठहरायें, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। बहुत करके तो वे मान जायेंगे। पर कदाचित् न मानें, तो आपको जेलके लिए तैयार रहना होगा। मेरा तो यह मत है कि लज्जा जेल जाने में नहीं, बल्कि चोरी करनेमें है। लज्जाका काम तो हो चुका है। जेल जाना पड़े, तो उसे प्रायश्चित्त समझिए। सच्चा प्रायश्चित्त तो भविष्यमें फिर कभी चुंगीकी चोरी न करनेकी प्रतिज्ञामें है।”

मैं नहीं कह सकता कि रुस्तमजी सेठ इन सारी बातोंको भली-भाँति समझ गये थे। वे बहादुर आदमी थे। पर इस बार हिम्मत हार गये थे। उनकी प्रतिष्ठाके नष्ट होने का समय आ गया था। और प्रश्न था कि कहीं उनकी अपनी मेहनतसे बनाई हुई इमारत ढह न जाये।

वे बोले, “मैं आपसे कह चुका हूँ कि मेरा सिर आपकी गोद में है। आपको जैसा करना हो, वैसा कीजिए।”

मैंने इस मामले में विनयकी अपनी सारी शक्ति लगा दी। मैं अधिकारीसे मिला और सारी चोरीकी बात उससे निर्भयतापूर्वक कह दी। सब बहीखाते दिखा देनेको कहा और पारसी रुस्तमजीके पश्चात्तापकी बात भी कही।

अधिकारीने कहा, “मैं इस बूढ़े पारसीको चाहता हूँ। उसने मूर्खता की है। पर मेरा धर्म तो आप जानते हैं। बड़े वकील जैसा कहेंगे वैसा मुझे करना होगा। अतएव अपनी समझानेकी शक्तिका उपयोग आपको उनके सामने करना होगा।”

मैंने कहा: “पारसी रुस्तमजीको अदालत में घसीटने पर जोर न दिया जाये, तो मुझे सन्तोष हो जायेगा।”