ऐसी पोशाक पहननेवालेकी गिनती गरीब आदमीमें होती थी। उस समय वीरमगाँव अथवा बढ़वाणमें प्लेगके कारण तीसरे दर्जेके यात्रियोंकी जाँच होती थी। मुझे थोड़ा बुखार था। जाँच करनेवाले अधिकारीने हाथ देखा, तो वह उसे गरम लगा। इसलिए उसने मुझे राजकोटमें डाक्टरसे मिलनेका हुक्म दिया और मेरा नाम लिख लिया।
बम्बईसे किसीने तार या पत्र भेजा होगा। इसलिए बढ़वान स्टेशन पर वहाँके प्रसिद्ध प्रजा-सेवक दर्जी मोतीलाल मुझसे मिले। उन्होंने मुझसे वीरमगाँवकी चुंगी-सम्बन्धी जाँच-पड़तालकी और उसके कारण होनेवाली परेशानियोंकी चर्चा की। मैं ज्वरसे पीड़ित था, इसलिए बातें करनेकी बहुत इच्छा न थी। मैंने उन्हें थोड़ेमें ही जवाब दिया:
“आप जेल जानेको तैयार हैं?”
मैंने माना था कि बिना विचारे उत्साहमें जवाब देनेवाले बहुतेरे युवकोंकी भाँति ही मोतीलाल भी होंगे। पर उन्होंने बहुत दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया:
“हम जरूर जेल जायेंगे। पर आपको हमें रास्ता दिखाना होगा। काठियावाड़ीके नाते आप पर हमारा पहला अधिकार है। इस समय तो हम आपको रोक नहीं सकते, पर लौटते समय आपको बढ़वान उतरना होगा। यहाँके युवकोंका काम और उत्साह देखकर आप खुश होंगे। आप अपनी सेनामें जब चाहेंगे तब हमें भरती कर सकेंगे।”
मोतीलाल पर मेरी आँख टिक गई। उनके दूसरे साथियोंने उनकी स्तुति करते हुए कहा:
“ये भाई दर्जी हैं। अपने धन्धेमें कुशल हैं, इसलिए रोज एक घंटा काम करके हर महीने लगभग पन्द्रह रुपये अपने खर्चके लिए कमा लेते हैं, और बाकीका सारा समय सार्वजनिक सेवामें बिताते हैं। ये हम सब पढ़े-लिखोंका मार्गदर्शन करते हैं और हमें लज्जित करते हैं।”
बाद में भाई मोतीलालके सम्पर्क में काफी आया था और मैंने अनुभव किया था कि उनकी उपर्युक्त स्तुतिमें लेशमात्र भी अतिशयोक्ति नहीं थी। जब सत्याग्रहाश्रम स्थापित हुआ, तो वे हर महीने वहाँ कुछ दिन अपनी हाजिरी दर्ज करा ही जाते थे। बालकोंको सीना सिखाते और आश्रमका सिलाई-काम भी कर जाते थे। वीरम-गाँवकी बात तो मुझे रोज सुनाते रहते थे। वहाँ यात्रियोंको जिन मुसीबतोंका सामना करना पड़ता था, वे उनके लिए असह्य थीं। इन मोतीलालको भरी जवानीमें बीमारी उठा ले गई और बढ़वान उनके बिना सूना हो गया।
राजकोट पहुँचने पर दूसरे दिन सवेरे मैं उपर्युक्त आज्ञाके अनुसार अस्पतालमें हाजिर हुआ। वहाँ तो मैं अपरिचित नहीं था। डाक्टर शरमाये और उक्त जाँच करनेवाले अधिकारी पर गुस्सा होने लगे। मुझे गुस्सेका कोई कारण न दिखाई पड़ा। अधिकारीने अपने धर्मका पालन ही किया था। वह मुझे पहचानता नहीं था, और पहचानता होता, तो भी उसने जो हुक्म दिया, वह देना उसका धर्म था। पर चूँकि