मेरा विचार शान्तिनिकेतनमें कुछ समय रहनेका था। किन्तु विधाता मुझे जबरदस्ती घसीटकर ले गया। मैं मुश्किलसे वहाँ एक हफ्ता रहा होऊँगा कि इतने में पूनासे गोखलेके अवसानका तार मिला। शान्तिनिकेतन शोकमें डूब गया। सब मेरे पास संवेदनाके लिए आये। मन्दिरमें विशेष सभा की गई।[१] यह गम्भीर दृश्य अपूर्व था। मैं उसी दिन पूनाके लिए रवाना हुआ। पत्नी और मगनलाल गांधीको अपने साथ लिया, बाकी सब शान्तिनिकेतनमें रहे।
बर्दवानतक एन्ड्रयूज मेरे साथ आये थे। उन्होंने मुझसे पूछा, “क्या आपको ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान में आपके लिए सत्याग्रह करनेका अवसर आयेगा? और अगर ऐसा हो, तो कब आयेगा, इसकी कोई कल्पना आपको है?”
मैंने जवाब दिया, “इसका उत्तर देना कठिन है। अभी एक वर्षतक तो मुझे कुछ करना ही नहीं है। गोखलेने मुझसे प्रतिज्ञा करवाई है कि मुझे एक वर्ष तक भ्रमण करना है, किसी सार्वजनिक प्रश्नपर अपना विचार न तो बनाना है, न प्रकट करना है। मैं इस प्रतिज्ञाका अक्षरशः पालन करूँगा। बादमें भी जब मुझे किसी प्रश्न पर कुछ कहने की जरूरत होगी तभी मैं कहूँगा। इसलिए मैं नहीं समझता कि पाँच वर्षतक सत्याग्रह करनेका कोई अवसर आयेगा।
यहाँ यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि ‘हिन्द स्वराज्य’ में मैंने जो विचार व्यक्त किये हैं, गोखले उनका मजाक उड़ाते थे और कहते थे, “आप एक वर्ष हिन्दुस्तान में रहकर देखेंगे, तो आपके विचार अपने-आप ठिकाने आ जायेंगे।”
५. तीसरे दर्जेको विडम्बना
बर्दवान पहुँचकर हमें तीसरे दर्जेका टिकट लेना था। उसे लेनेमें परेशानी हुई। जवाब मिला: “तीसरे दर्जेके यात्रीको टिकट पहलेसे नहीं दिया जाता।” मैं स्टेशन-मास्टरसे मिलने गया। उनके पास मुझे कौन जाने देता? किसीने दया करके बता दिया कि स्टेशन-मास्टर वे रहे। मैं वहाँ पहुँचा। उनसे भी उपर्युक्त उत्तर ही मिला। खिड़कीके खुलने पर टिकट लेने गया। पर टिकट आसानीसे मिलनेवाला न था। बलवान यात्री एकके बाद एक घुसते जाते और मुझ-जैसोंको पीछे हटाते जाते। आखिर टिकट मिला।
गाड़ी आई। उसमें भी जो बलवान थे वे घुस गये। बैठे हुओं और चढ़नेवालोंके बीच गाली-गलौज और धक्का-मुक्की शुरू हुई। इसमें हिस्सा लेना मेरे लिए सम्भव न था। हम तीनों इधर से उधर चक्कर काटते रहे। सब ओरसे एक ही जवाब मिलता था: “यहाँ जगह नहीं है।” मैं गार्डके पास गया। उसने कहा, “जगह मिले तो बैठो, नहीं तो दूसरी ट्रेनमें जाना।”
मैंने नम्रतापूर्वक कहा, “लेकिन मुझे जरूरी काम है।” यह सुननेके लिए गार्ड के पास समय नहीं था। मैंने हारकर मगनलालसे कहा, “जहाँ जगह मिले, बैठ
- ↑ देखिए खण्ड १३, पृष्ट २८।