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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३२५

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

इस स्नान घरमें नहाने देनेके अनौचित्यके प्रति आँखें मूँद लीं। सत्यके पुजारीको यह भी शोभा नहीं देता। पत्नीको वहाँ जानेका कोई आग्रह नहीं था, पर पतिके मोहरूपो सुवर्णपात्रने सत्यको ढाँक लिया।[]

 

६. मेरा प्रयत्न

पूना पहुँचनेपर गोखलेकी उत्तरक्रिया आदि सम्पन्न करके[] हम सब इस प्रश्नकी चर्चामें लग गये कि अब सोसाइटी किस तरह चलाई जाये, और मुझे उसमें सम्मिलित होना चाहिए या नहीं। मुझपर भारी बोझ आ पड़ा। गोखलेके जीते-जी मेरे लिए सोसाइटीमें दाखिल होनेका प्रयत्न करना आवश्यक न था। मुझे केवल गोखलेकी आज्ञा और इच्छाके अनुसार चलना था। मुझे यह स्थिति पसन्द थी। भारतवर्ष के तूफानी समुद्रमें कूदते समय मुझे एक कर्णधारकी आवश्यकता थी, और गोखलेके समान कर्णधारकी छायामें मैं सुरक्षित था। अब मैंने अनुभव किया कि मुझे सोसाइटीमें भरती होनेके लिए सतत् प्रयत्न करना चाहिए। मुझे यह लगा कि गोखलेकी आत्मा यही चाहेगी। मैने बिना संकोचके और दृढ़तापूर्वक यह प्रयत्न शुरू किया।

इस समय सोसाइटीके लगभग सभी सदस्य पूनामें उपस्थित थे। मैंने उन्हें मनाना और मेरे विषयमें उन्हें जो डर था उसे दूर करना शुरू किया। किन्तु मैंने देखा कि सदस्योंमें मतभेद था। कुछकी राय मुझे दाखिल करनेके पक्षमें थी, दूसरोंकी दृढ़तापूर्वक मेरे प्रवेशका विरोध करती थी। मैं अपने प्रति दोनों पक्षोंके प्रेमको देख सकता था। पर मेरे प्रति प्रेमकी अपेक्षा सोसाइटीके प्रति उनकी वफादारी कदाचित् अधिक थी; प्रेमसे कम तो थी ही नहीं। इस कारण हमारी चर्चा मीठो और केवल सिद्धान्तका अनुसरण करते हुए होती थी। विरुद्ध पक्षवालोंको यही लगा कि अनेक विषयोंमें मेरे और उनके विचारोंके बीच उत्तर-दक्षिणका अन्तर था। इससे भी अधिक उन्हें यह लगा कि जिन ध्येयोंको ध्यान में रखकर गोखलेने सोसाइटीकी रचना की थी, मेरे सोसाइटीमें रहनेसे उन ध्येयोंके ही खतरेमें पड़ जानेकी पूरी संभावना है। स्वभावतः यह उन्हें असह्य प्रतीत हुआ।

लम्बी चर्चा के बाद हम एक-दूसरेसे अलग हुए। सदस्योंने अन्तिम निर्णयकी बात दूसरी सभातक उठा रखी।

घर लौटते हुए मैं विचारोंके भँवरमें पड़ गया। बहुमतसे दाखिल होनेका प्रसंग आनेपर, क्या वैसा करना मेरे लिए इष्ट होगा? क्या वह गोखलेके प्रति मेरी वफादारी मानी जायेगी? अगर मत मेरे विरुद्ध प्रकट हो, तो क्या उस दशामें मैं सोसाइटीकी स्थितिको नाजुक बनानेका निमित्त न बनूँगा? मैंने स्पष्ट देखा कि जबतक

  1. हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यास्यापिहितं मुखम्। ईशोपनिषद मंत्र १५।
  2. गांधीजीने नदीमें तर्पण किया था; देखिए खण्ड १३; पृष्ठ १६४।