सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३२७

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२९५
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

था। पाखाने नरकके कुण्ड ही थे। मल-मूत्रादिमें से चलकर या उन्हें लाँघकर पाखानेमें जाना होता था!

मेरे लिए यह भयंकर बात थी। मैं जहाजके अधिकारीके पास पहुँचा; पर कौन सुनता है? यात्रियोंने अपनी गन्दगीसे डेकको भर डाला था। वे जहाँ बैठे होते वहीं थूक देते, वहीं सुरतीकी पीककी पिचकारियाँ चलाते, वहीं खाने-पीनेके बाद बचा हुआ कचरा डालते। बातचीतसे होनेवाले कोलाहलकी कोई सीमा न थी। सभी अपने लिए अधिकसे-अधिक जगह घेरनेकी कोशिश करते थे। कोई किसीकी सुविधाका विचार तक न करता था। वे स्वयं जितनी जगह घेरते, सामान उससे अधिक जगह घेर लेता था। ये दो दिन बड़ी घबराहटमें बीते।

रंगून पहुँचने पर मैंने एजेंटको सारा हाल लिख भेजा।[] लौटते समय भी डेकपर ही आया। पर इस पत्रके और डॉ॰ मेहताके प्रबन्धके फलस्वरूप अपेक्षाकृत अधिक सुविधासे आया।

मेरे फलाहारकी झंझट तो यहाँ भी अपेक्षाकृत अधिक ही रहती थी। डॉ॰ मेहताके साथ ऐसा सम्बन्ध था कि उनके घरको मैं अपना ही घर समझ सकता था। इससे मैंने पदार्थोंकी मात्रा पर तो अंकुश रख लिया था, लेकिन उनकी कोई मर्यादा निश्चित नहीं की थी। इस कारण तरह-तरहका जो मेवा आता, उसका मैं विरोध न करता। नाना प्रकारकी वस्तुएँ आँखों और जीभको रुचिकर लगती थीं। खानेका कोई निश्चित समय नहीं था। मैं स्वयं जल्दी खा लेना पसन्द करता था, इसलिए बहुत देर नहीं होती थी। फिर भी रातके आठ-नौ तो सहज ही बज जाते थे।

सन् १९१५ में हरद्वार में कुम्भका मेला था। उसमें जानेकी मेरी कोई खास इच्छा नहीं थी। लेकिन मुझे महात्मा मुंशीरामजीके दर्शनोंके लिए जरूर जाना था। कुम्भके अवसरपर गोखलेके भारत-सेवक-समाजने एक बड़ी टुकड़ी भेजी थी। उसका प्रबन्ध श्री हृदयनाथ कुंजरूके जिम्मे था। स्व॰ डा॰ देव भी उसमें थे। उनका यह प्रस्ताव था कि इस काम में मदद करनेके लिए मैं अपनी टुकड़ी भी ले जाऊँ। शान्ति-निकेतन-वाली टुकड़ीको लेकर मगनलाल गांधी मुझसे पहले हरिद्वार पहुँच गये थे। रंगूनसे लौटकर मैं भी उनसे जा मिला।

कलकत्तेसे हरद्वार पहुँचने में खूब परेशानी उठानी पड़ी। डिब्बोंमें कभी-कभी रोशनी तक न होती थी। सहारनपुरसे तो यात्रियोंको मालगाड़ीके या जानवरोंके डिब्बोंमें ही ठूँस दिया गया था। खुले, बिना छतवाले डिब्बोंपर दोपहरका सूरज तपता था। नीचे निरे लोहेका फर्श था। फिर घबराहटका क्या पूछना था? इतने पर भी श्रद्धालु हिन्दू अत्यन्त प्यासे होने पर भी ‘मुसलमान पानी’ के आने पर उसे हरगिज न पीते थे। ‘हिन्दू पानी’ की आवाज आती तभी वे पानी पीते। इन्हीं श्रद्धालु हिन्दुओंको डाक्टर दवामें शराब दे, माँसका सत दे अथवा मुसलमान या ईसाई कम्पाउंडर पानी दे, तो उसे लेनेमें उन्हें संकोच नहीं होता, और न पूछताछ करनेकी जरूरत होती है।

  1. देखिए खण्ड १३, पृष्ठ ४३।