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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३३६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

सन् १९१६ में भारत-भूषण पण्डित मालवीयजीने यह प्रश्न धारासभा में उठाया था और लार्ड हार्डिगने उनका प्रस्ताव स्वीकार करके घोषित किया था कि ‘समय आनेपर’ इस प्रथाको नष्ट करनेका वचन मुझे सम्राट्की ओरसे मिला है। लेकिन मुझे तो स्पष्ट लगा कि इस प्रथाको तत्काल ही बन्द करनेका निर्णय हो जाना चाहिए। हिन्दुस्तानने अपनी लापरवाहीसे बरसोंतक इस प्रथाको चलने दिया। मैंने माना कि अब इस प्रथाको बन्द कराने योग्य जागृति लोगोंमें आ गई है। मैं कुछ नेताओंसे मिला, कुछ समाचारपत्रोंने इस विषय में लिखा और मैंने देखा कि लोकमत इस प्रथाको मिटा देनेके पक्षमें है। क्या इसमें सत्याग्रहका उपयोग हो सकता है? मुझे इस विषय में कोई शंका नहीं थी, पर उसका उपयोग कैसे किया जाये, सो मैं नहीं जानता था।

इस बीच वाइसरायने ‘समय आनेपर’ शब्दका अर्थ समझानेका अवसर खोज लिया। उन्होंने घोषित किया कि “दूसरी व्यवस्था करनेमें जितना समय लगेगा उतने समयमें” यह प्रथा उठा दी जायेगी।

अतएव जब सन् १९१७ के फरवरी महीने में भारत-भूषण पण्डित मालवीयजीने गिरमिट- प्रथा सदाके लिए समाप्त कर देनेका कानून बड़ी धारासभा में पेश करनेकी इजाजत माँगी, तो वाइसरायने वैसा करनेसे इन्कार कर दिया। अतएव इस प्रश्नके सम्बन्ध में मैंने हिन्दुस्तान में घूमना शुरू किया।

भ्रमण आरम्भ करनेसे पहले मुझे वाइसरायसे मिल लेना उचित मालूम हुआ। उन्होंने तुरन्त ही मुझे मिलनेकी तारीख भेजी। उस समयके श्री मेफी, अब सर जान मेफी, उनके मन्त्री थे। श्री मेफीके साथ मेरा अच्छा सम्बन्ध स्थापित हो गया। लार्ड चेम्सफोर्डके साथ सन्तोषजनक बातचीत हुई। उन्होंने निश्चयपूर्वक तो कुछ न कहा, पर मुझे उनकी मददकी आशा बँधी।

भ्रमणका आरम्भ मैंने बम्बईसे किया। बम्बई में सभा करनेका जिम्मा श्री जहाँगीर पेटिटने अपने सिर लिया। इम्पीरियल सिटिजनशिप एसोसिएशनके नामसे सभा हुई। उसमें पेश किये जानेवाले प्रस्तावोंको तैयार करनेके लिए समितिकी बैठक हुई। उसमें डा॰ रीड, सर लल्लूभाई शामलदास, श्री नटराजन आदि थे। श्री पेटिट तो थे ही। प्रस्ताव में गिरमिटिया प्रथा बन्द करनेकी विनती करनी थी। प्रश्न यह था कि वह कब बन्द की जाये? तीन सुझाव थे: ‘जितनी जल्दी हो सके,’ ‘इकतीसवीं जुलाई तक’ और ‘तुरन्त।’ ‘इकतीसवीं जुलाई’ का मेरा सुझाव था। मुझे तो निश्चित तारीखकी जरूरत थी, ताकि उस अवधि में कुछ न हो, तो यह सोचा जा सके कि आगे क्या करना है या क्या हो सकता है। सर लल्लूभाईका सुझाव ‘तुरन्त’ शब्द रखनेका था। उन्होंने कहा: “इकतीसवीं जुलाई’ की अपेक्षा ‘तुरन्त’ शब्द अधिक शीघ्रता-सूचक है।” मैंने समझानेका प्रयत्न किया कि जनता ‘तुरन्त’ शब्दको नहीं समझ सकती। जनतासे कुछ काम लेना हो, तो निश्चयात्मक शब्द होना चाहिए। ‘तुरन्त’ का अर्थ तो सब अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार करेंगे। सरकार उसका एक अर्थं करेगी, जनता दूसरा करेगी। ‘इकतीसवीं जुलाई’ का अर्थ सब एक ही करेंगे,