सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३३९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३०७
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वहाँ जानेसे पहले मैं चम्पारनका नाम तक नहीं जानता था। नीलकी खेती होती है, इसका ख्याल भी नहीं के बराबर था। नीलकी गोटियाँ मैंने देखी थीं, पर वे चम्पारन में होती हैं और उनके कारण हजारों किसानोंको कष्ट भोगना पड़ता है, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी।

राजकुमार शुक्ल नामक चम्पारनके एक किसान थे। उन्हें इस प्रथासे कष्ट हो रहा था। यह उन्हें अखरता था। लेकिन अपने इस दुःखके कारण उनमें नीलके इस दागको सबके लिए धो डालनेकी तीव्र लगन पैदा हो गई थी।

जब मैं लखनऊ कांग्रेस में गया, तो वहाँ इस किसानने मेरा पीछा पकड़ा। ‘वकील बाबू आपको सब हाल बतायेंगे,’ वे ऐसा कहते जाते और मुझे चम्पारन आनेका निमन्त्रण देते जाते थे। वकील बाबूसे मतलब था, चम्पारनके मेरे प्रिय साथी, बिहारके सेवा-जीवनके प्राण ब्रजकिशोर बाबूसे। राजकुमार शुक्ल उन्हें मेरे तम्बू में लाये। उन्होंने काले आलपाकाकी अचकन, पतलून वगैरा पहन रखी थी। मेरे मन पर उनकी कोई अच्छी छाप नहीं पड़ी। मैंने मान लिया कि वे भोले किसानोंको लूटनेवाले कोई वकील साहब होंगे। मैंने उनसे चम्पारनकी थोड़ी कथा सुनी। अपने रिवाजके अनुसार मैंने जवाब दिया, “खुद देखे बिना इस विषय पर मैं कोई राय नहीं दे सकता। आप कांग्रेस में बोलियेगा। मुझे तो फिलहाल छोड़ ही दीजिए।” राजकुमार शुक्लको कांग्रेसकी मददकी तो जरूरत थी ही। ब्रजकिशोर बाबू चम्पारनके बारेमें कांग्रेस में बोले और सहानुभूति-सूचक प्रस्ताव पास हुआ।

राजकुमार शुक्ल प्रसन्न हुए। पर उन्हें इतनेसे ही सन्तोष न हुआ। वे तो खुद मुझे चम्पारनके किसानोंके दुःख बताना चाहते थे। मैंने कहा, “अपने भ्रमणमें मैं चम्पारनको भी सम्मिलित कर लूँगा और एक-दो दिन वहाँ ठहरूँगा।” उन्होंने कहा: “एक दिन काफी होगा। खुद अपनी आँखों देख तो लीजिए।

लखनऊ से मैं कानपुर गया था। वहाँ भी राजकुमार शुक्ल हाजिर ही थे। “यहाँसे चम्पारन बहुत नजदीक है। एक दिन दे दीजिए।” “अभी मुझे माफ कीजिए। पर मैं चम्पारन आनेका वचन देता हूँ।” यह कहकर मैं ज्यादा बँध गया।

मैं आश्रम गया तो राजकुमार शुक्ल वहाँ भी मेरे पीछे लगे ही रहे। “अब तो दिन मुकर्रर कीजिए।” मैंने कहा, “मुझे फलाँ तारीखको कलकत्ते जाना है, वहाँ आइए और मुझे ले जाइए।” कहाँ जाना, क्या करना और क्या देखना है, इसकी मुझे कोई जानकारी न थी।

कलकत्तेमें भूपेन बाबूके यहाँ मेरे पहुँचनेके पहले उन्होंने वहाँ डेरा डाल दिया था। इस अपढ़, अनगढ़ परन्तु निश्चयवान किसानने मुझे जीत लिया।

सन् १९१७ के आरम्भमें कलकत्तेसे हम दो व्यक्ति रवाना हुए। दोनोंकी एक-सी जोड़ी थी। दोनों किसान-जैसे ही लगते थे। राजकुमार शुक्ल जिस गाड़ीमें लेbगये, उसपर हम दोनों सवार हुए। सवेरे पटना उतरे।

पटनाकी यह मेरी पहली यात्रा थी। वहाँ किसीके साथ मेरा ऐसा परिचय नहीं था, जिससे उनके घर उतर सकूँ। मैंने यह सोच लिया था कि राजकुमार शुक्ल अनपढ़ किसान हैं, तथापि उनका वसीला तो होगा ही। ट्रेनमें मुझे उनकी