कुछ अधिक जानकारी मिलने लगी। पटनामें उनका परदा खुल गया। राजकुमार शुक्लकी बुद्धि निर्दोष थी। उन्होंने जिन वकीलोंको अपना मित्र मान रखा था, वे वकील उनके मित्र नहीं थे; बल्कि वे तो राजकुमार शुक्लको अपना आश्रित जैसा मानते थे। किसान मुवक्किल और वकीलोंके बीच चौमासेकी गंगाके चौड़े पाटके बराबर अन्तर था।
मुझे वे राजेन्द्र बाबूके[१] घर ले गये। राजेन्द्र बाबू पुरी अथवा और कहीं गये थे। बंगले पर एक-दो नौकर थे। मेरे साथ खानेकी कुछ सामग्री थी। मुझे थोड़ी खजूरकी जरूरत थी। बेचारे राजकुमार शुक्ल बाजारसे ले आये।
पर बिहार में तो छुआछूतका बहुत कड़ा रिवाज था। मेरी बालटीके पानीके छींटे नौकरको भ्रष्ट करते थे। नौकरको क्या पता कि मैं किस जातिका हूँ। राजकुमार शुक्लने अन्दरके पाखानेका उपयोग करनेको कहा। नौकरने बाहरके पाखानेकी ओर इशारा किया। मेरे लिए इसमें परेशान या गुस्सा होनेका कोई कारण न था। इस प्रकारके अनुभव कर-करके मैं बहुत पक्का हो चुका था। नौकर तो अपने धर्मका पालन कर रहा था और राजेन्द्र बाबूके प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा कर रहा था।
इन मनोरंजक अनुभवोंके कारण जहाँ राजकुमार शुक्लके प्रति मेरा आदर बढ़ा, वहाँ उनके विषय में मेरा ज्ञान भी बढ़ा। पटनासे लगाम मैंने अपने हाथमें ले ली।
१३. बिहारी सरलता
मौलाना मजहरुल हक और मैं एक समय लन्दन में पढ़ते थे। उसके बाद हम बम्बई में सन् १९१५ की कांग्रेस में मिले थे। उस समय वे मुस्लिम लीगके अध्यक्ष थे। उन्होंने पुरानी पहचान बताकर कहा था कि आप कभी पटना आयें, तो मेरे घर अवश्य पधारिए। इस निमन्त्रणके आधार पर मैंने उन्हें पत्र लिखा और अपना काम बतलाया। वे तुरन्त अपनी मोटर लाये और मुझे अपने घर ले चलनेका आग्रह किया। मैंने उनका आभार माना और उनसे कहा कि जिस जगह मुझे जाना है, वहाँके लिए वे मुझको पहली ट्रेनसे रवाना कर दें। रेलवे गाइडसे मुझे कुछ पता नहीं चल सकता था। उन्होंने राजकुमार शुक्लसे बातें कीं और सुझाया कि पहले मुझे मुजफ्फरपुर जाना चाहिए। उसी दिन शामको मुजफ्फरपुरकी ट्रेन जाती थी। उन्होंने मुझे उसमें रवाना कर दिया।
उन दिनों आचार्य कृपलानी मुजफ्फरपुर में रहते थे। मैं उन्हें जानता था। जब मैं हैदराबाद गया था, तब उनके महान त्यागकी, उनके जीवनकी और उनके पैसे से चलनेवाले आश्रमकी बात डा॰ चौइथरामके मुँहसे मैंने सुनी थी। वे मुजफ्फरपुर कालेज में प्रोफेसर थे। इस समय प्रोफेसरी छोड़ चुके थे। मैंने उन्हें तार किया।
- ↑ देखिए खण्ड १३, पृ४ ३६२। पत्र बाँकीपुरसे लिखा गया है और इसमें मकानमालिकका नाम नहीं दिया है।