सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३४१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३०९
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

ट्रेन आधी रातको मुजफ्फरपुर पहुँचती थी। वे अपने शिष्य-मण्डलके साथ स्टेशन पर आये। पर उनके घरबार नहीं था। वे अध्यापक मलकानीके यहाँ रहते थे। मुझे उनके घर ले गये। मलकानी वहाँके कालेज में प्रोफेसर थे। उस समयके वातावरण में सरकारी कालेजके प्रोफेसरका मुझे अपने यहाँ टिकाना एक असाधारण बात मानी जायेगी।

कृपलानीजीने बिहारकी और उसमें भी तिरहुत विभागकी दीन दशाकी बातकी और मेरे कामकी कठिनाईकी कल्पना दी। कृपलानीजीने बिहारवालोंके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध जोड़ लिया था। उन्होंने उन लोगोंसे मेरे कामका जिक्र कर रखा था।

सवेरे वकीलोंका एक छोटा-सा दल मेरे पास आया। उनमेंसे रामनवमीप्रसाद मुझे याद रह गये हैं। उन्होंने अपने आग्रह से मेरा ध्यान आकर्षित किया था। उन्होंने कहा:

“आप जो काम करने आये हैं, वह इस जगह से न होगा। आपको तो हम-जैसोंके यहाँ ठहरना चाहिए। गया बाबू यहाँके प्रसिद्ध वकील हैं। उनकी ओरसे मैं आग्रह करता हूँ कि आप उनके घर ठहरिए। हम सब सरकारसे डरते जरूर हैं। लेकिन हमसे जितनी बनेगी उतनी मदद हम आपकी करेंगे। राजकुमार शुक्लकी बहुत-सी बातें सच हैं। दुःख इस बातका है कि आज हमारे नेता यहाँ नहीं हैं। बाबू ब्रजकिशोरप्रसाद और राजेन्द्रप्रसादको मैंने तार किये हैं। दोनों तुरन्त यहाँ आ जायेंगे और आपको पूरी जानकारी व मदद दे सकेंगे। मेहरबानी करके आप गया बाबूके यहाँ चलिए।”

इस भाषणसे मैं ललचाया। इस डरसे कि कहीं मुझे अपने घरमें ठहराने से गया बाबू कठिनाई में न पड़ जायें, मुझे संकोच हो रहा था। पर गया बाबूने मुझे निश्चिन्त कर दिया। मैं गया बाबूके घर गया। उन्होंने और उनके परिवारवालोंने मुझे अपने प्रेमसे सराबोर कर दिया।

ब्रजकिशोर बाबू दरभंगासे आये। राजेन्द्र बाबू पुरीसे आये। यहाँ जिन्हें देखा, वे लखनऊवाले ब्रजकिशोरप्रसाद नहीं थे। उनमें बिहारवासीकी नम्रता, सादगी, भलमनसी, असाधारण श्रद्धा देखकर मेरा हृदय हर्षसे छलक उठा। ब्रजकिशोर बाबूके प्रति बिहारके वकील-मण्डलका आदरभाव देखकर मुझे सानन्द आश्चर्य हुआ।

इस मण्डलके और मेरे बीच जीवन-भरकी गाँठ बँध गई। ब्रजकिशोर बाबूने मुझे सारी हकीकतोंकी जानकारी दी। वे गरीब किसानोंके लिए मुकदमे लड़ते थे। ऐसे दो मुकदमे चल रहे थे। इस तरहके मुकदमोंकी पैरवी करके वे थोड़ा व्यक्तिगत आश्वासन प्राप्त कर लिया करते थे। कभी-कभी उसमें भी विफल हो जाते थे। इन भोले किसानोंसे फीस तो वे लेते ही थे। त्यागी होते हुए भी ब्रजकिशोर बाबू अथवा राजेन्द्र बाबू मेहनताना लेनेमें कभी संकोच नहीं करते थे। उनकी दलील यह थी कि पेशेके काम में मेहनताना न लें, तो उनका घर-खर्च न चले और वे लोगोंकी मदद भी न कर सकें। उनके मेहनतानेके और बंगाल तथा बिहारके बैरिस्टरोंको दिये जानेवाले मेहनतानेके, कल्पनामें न आ सकनेवाले आँकड़े सुनकर, मेरा दम घुटने लगा।