“...साहबको हमने ‘ओपिनियन’ (सम्मति) के लिए दस हजार रुपये दिये।” हजारोंके सिवा तो मैंने बात ही न सुनी।
इस मित्र-मण्डलने इस विषय में मेरा मीठा उलाहना प्रेमपूर्वक सुन लिया। उसका उन्होंने गलत अर्थ नहीं लगाया।
मैंने कहा: “इन मुकदमोंको पढ़ जानेके बाद मेरी राय तो यह बनी है कि अब हमें ये मुकदमे लड़ना ही बन्द कर देना चाहिए। ऐसे मुकदमोंसे लाभ बहुत कम होता है। जो रैयत इतनी कुचली हुई है, जहाँ सब इतने भयभीत रहते हैं, वहाँ कचहरियोंकी मारफत बहुत थोड़ी ही राहत मिल सकती है। लोगोंके लिए सच्ची दवा तो उनके डरको भगाना है। जब तक यह ‘तिनकठिया’ प्रथा रद न हो, तब तक हम चैनसे बैठ नहीं सकते। मैं तो दो दिन में जितना देखा जा सके उतना देखने आया था। लेकिन अब देख रहा हूँ कि यह काम दो वर्ष भी ले सकता है। इतना समय भी लगे तो मैं देने को तैयार हूँ। मुझे यह तो सूझ रहा है कि इस कामके लिए क्या करना चाहिए। लेकिन इसमें आपकी मदद जरूरी है।”
ब्रजकिशोर बाबूको मैंने बहुत ठंडे दिमागका पाया। उन्होंने शान्तिसे उत्तर दिया: “हमसे जो मदद बनेगी हम देंगे, लेकिन हमें समझाइए कि आप किस प्रकारकी मदद चाहते हैं।”
इस बातचीत में हमने सारी रात बिता दी।
मैंने कहा, “मुझे आपकी वकालतकी शक्तिकी अधिक जरूरत नहीं पड़ेगी। आपके समान लोगोंसे तो मैं लेखक और दुभाषियेका काम लेना चाहूँगा। मैं देखता हूँ कि इसमें जेल भी जाना पड़ सकता है। मैं इसे पसन्द करूँगा कि आप यह जोखिम उठायें। पर आप इसे उठाना न चाहें, तो न भी उठायें। वकालत छोड़कर लेखक बनने और अपने धन्धेको अनिश्चित अवधिके लिए बन्द करनेकी माँग करके मैं आप लोगोंसे कुछ कम नहीं माँग रहा हूँ। यहाँकी हिन्दी-बोली समझने में मुझे कठिनाई होती है। कागज-पत्र सब कैथी में या उर्दूमें लिखे होते हैं, जिन्हें मैं पढ़ नहीं सकता। इनके तरजुमेकी मैं आपसे आशा रखता हूँ। यह काम पैसे देकर कराना हमारे बसका नहीं है। यह सब सेवाभावसे और बिना पैसेके होना चाहिए।”
ब्रजकिशोर बाबू समझ गये; किन्तु उन्होंने मुझसे और अपने साथियोंसे जिरह शुरू की। मेरी बातोंके फलितार्थ पूछे। मेरे अनुमानके अनुसार वकीलोंको किस हद तक त्याग करना चाहिए, कितने लोगोंकी आवश्यकता होगी, थोड़े-थोड़े लोग थोड़ी-थोड़ी मुद्दतके लिए आयें, तो काम चलेगा या नहीं, इत्यादि प्रश्न मुझसे पूछे। वकीलों से उन्होंने पूछा कि वे कितना त्याग कर सकते हैं।
अन्तमें उन्होंने अपना यह निश्चय प्रकट किया: “हम इतने लोग आप जो काम हमें सौंपेंगे, वह कर देनेके लिए तैयार रहेंगे। इनमें से जितनोंको आप जिस समय चाहेंगे उतने आपके पास रहेंगे। जेल जानेकी बात नई है। उसके लिए हम शक्ति-संचय करनेकी कोशिश करेंगे।”