वाले एक प्रजाजनके नाते तो मुझे जो आज्ञा दी गई है उसे स्वीकार करनेकी स्वाभाविक इच्छा होनी चाहिए, और हुई थी। पर मुझे लगा कि वैसा करनेमें जिनके लिए मैं यहाँ आया हूँ मेरा उनके प्रति जो कर्त्तव्य है मैं उसकी हत्या करूँगा। मुझे लगता है कि आज मैं उनकी सेवा उनके बीच रहकर ही कर सकता हूँ। इसलिए स्वेच्छासे चम्पारन छोड़ना मेरे लिए सम्भव नहीं है। इस धर्म-संकटके कारण मुझे चम्पारनसे हटाने की जिम्मेदारी मैं सरकार पर डाले बिना रह न सका। मैं इस बातको अच्छी तरह समझता हूँ कि हिन्दुस्तान के लोक-जीवन में मेरी-जैसी प्रतिष्ठा रखनेवाले आदमीको कोई कदम उठाकर उदाहरण प्रस्तुत करते समय बड़ी सावधानी रखनी चाहिए। पर मेरा दृढ़ विश्वास है कि आज जिस अटपटी परिस्थितिमें हम पड़े हुए हैं, उसमें मेरी-जैसी परिस्थितियों में फँसे हुए स्वाभिमानी मनुष्यके सामने इसके सिवा दूसरा कोई सुरक्षित और सम्मानयुक्त मार्ग नहीं है कि आज्ञाका अनादर करके उसके बदले में जो दण्ड प्राप्त हो, उसे चुपचाप सहन कर लिया जाये।
“आप मुझे जो सजा देना चाहते हैं, उसे कम करानेकी भावनासे मैं यह बयान नहीं दे रहा हूँ। मुझे तो यही जता देना है कि आज्ञाका अनादर करने में मेरा उद्देश्य कानून द्वारा स्थापित सरकारका अपमान करना नहीं है, बल्कि मेरा हृदय जिस अधिक बड़े कानूनको—अर्थात् अन्तरात्माको आवाजको—स्वीकार करता है, उसका अनुसरण करना ही है।”
अब मुकदमेकी सुनवाईको मुलतवी रखनेकी जरूरत न रही थी, किन्तु चूँकि मजिस्ट्रेट और वकीलने इस परिणामकी आशा नहीं की थी, इसलिए सजा सुनानेके लिए अदालतने केस मुलतवी रखा। मैंने वाइसरायको सारी स्थिति तार[१] द्वारा सूचित कर दी थी। पटना भी तार भेजा था। भारत-भूषण पण्डित मालवीयजी आदिको भी वस्तुस्थितिकी जानकारी तारसे भेज दो थी।
सजा सुनने के लिए कोर्ट में जानेका समय हुआ, उससे कुछ पहले मेरे नाम मजिस्ट्रेटका हुक्म आया कि गवर्नर साहबकी आज्ञासे मुकदमा वापस ले लिया गया है। साथ ही कलेक्टरका पत्र मिला कि मुझे जो जाँच करनी हो, मैं करूँ और उसमें अधिकारियोंकी ओरसे जो मदद आवश्यक हो, सो माँग लूँ। ऐसे तात्कालिक और शुभ परिणामकी आशा हममेंसे किसीने नहीं रखी थी।
मैं कलेक्टर श्री हेकाकसे मिला। मुझे वह स्वयं भला और न्याय करनेमें तत्पर जान पड़ा। उसने कहा कि आपको जो कागज-पत्र या कुछ और देखना हो, सो आप माँग लें और मुझसे जब भी मिलना चाहें, मिल लिया करें।
दूसरी ओर सारे हिन्दुस्तानको सत्याग्रहका अथवा कानूनको सविनय अवज्ञाका पहला पदार्थ-पाठ मिला। अखबारोंमें इसकी खूब चर्चा हुई और चम्पारनको तथा मेरी जाँचको अनपेक्षित रीतिसे प्रसिद्धि मिल गई।
अपनी जाँच के लिए मुझे सरकारकी ओरसे तटस्थताकी तो आवश्यकता थी, परन्तु समाचारपत्रोंमें चर्चाकी और उनके संवाददाताओंकी आवश्यकता न थी। यही
- ↑ देखिए खण्ड १३, पृ४ ३६९-७०।