नहीं, बल्कि उनकी आवश्यकतासे अधिक टीकाओंसे और जाँचकी लम्बी-चौड़ी रिपोर्टों से हानि होनेका भय था। इसलिए मैंने खास-खास अखबारोंके सम्पादकोंसे प्रार्थना की थी कि वे रिपोटरोंको भेजने का खर्च न उठायें।[१] जितना छपाने की जरूरत होगी उतना मैं स्वयं भेजता रहूँगा और उन्हें खबर देता रहूँगा।
मैं समझ गया था कि चम्पारनके निलहे खूब चिढ़ गये हैं। मैं यह भी समझता था कि अधिकारी भी मनमें खुश न होंगे; अखबारोंमें सच्ची-झूठी खबरोंके छपनेसे वे अधिक चिढ़ेंगे। उनकी चिढ़का प्रभाव मुझ पर तो कुछ नहीं पड़ेगा, पर गरीब, डरपोक रैयत पर पड़े बिना न रहेगा। ऐसा होनेसे जो सच्ची स्थिति में जानना चाहता हूँ, उसमें बाधा पड़ेगी।
निलहोंको तरफसे विषैला आन्दोलन शुरू हो चुका था। उनकी ओरसे अखबारोंमें मेरे साथियोंके बारेमें खूब झूठा प्रचार हुआ, किन्तु मेरे अत्यन्त सावधान रहनेसे और बारीक-से-बारीक बातों में भी सत्य पर दृढ़ रहने की आदतके कारण उनके तीर व्यर्थ गये।
ब्रजकिशोर बाबूकी अनेक प्रकारसे निन्दा करनेमें निलहोंने जरा भी कसर नहीं रखी। पर ज्यों-ज्यों वे उनकी निन्दा करते गये, त्यों-त्यों ब्रजकिशोर बाबूकी प्रतिष्ठा बढ़ती गई।
ऐसी नाजुक स्थिति में मैंने रिपोर्टरों को आनेके लिए जरा भी प्रोत्साहित नहीं किया, न नेताओंको बुलाया। मालवीयजीने मुझे कहला भेजा था कि “जब जरूरत समझें, मुझे बुला लें, मैं आनेको तैयार हूँ।” उन्हें भी मैंने तकलीफ नहीं दी। मैंने इस लड़ाईको कभी राजनीतिक रूप धारण न करने दिया। जो कुछ होता था उसकी प्रासंगिक रिपोर्ट मैं मुख्य-मुख्य समाचारपत्रों को भेज दिया करता था। राजनीतिक काम करनेके लिए भी जहाँ राजनीतिकी गुंजाइश न हो, वहाँ उसे राजनीतिका स्वरूप देनेसे पाण्डेको दोनों दीनसे जाना पड़ता है। और, विषयका इस प्रकार स्थानान्तर न करनेसे दोनों सुधरते हैं। बहुत बारके अनुभवसे मैंने यह सब देख लिया था। चम्पारनकी लड़ाई यह सिद्ध कर रही थी कि शुद्ध लोकसेवामें प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रीतिसे राजनीति मौजूद ही रहती है।
१६. कार्य-पद्धति
चम्पारनको जाँचका विवरण देनेका अर्थ है, चम्पारनके किसानोंका इतिहास देना। उक्त विवरण इन प्रकरणों में नहीं दिया जा सकता। फिर, चम्पारनकी जाँचका अर्थ है, अहिंसा और सत्यका एक बड़ा प्रयोग। इसके सम्बन्धकी जितनी बातें मुझे प्रति सप्ताह सूझती हैं उतनी देता रहता हूँ। उसका विशेष विवरण तो पाठकोंको बाबू राजेन्द्रप्रसाद द्वारा लिखित इस सत्याग्रहके इतिहास में और ‘युगधर्म’ प्रेस द्वारा प्रकाशित उसके (गुजराती) अनुवादमें ही मिल सकता है।
- ↑ देखिए खण्ड १३, पृष्ठ ३८१।