सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३४९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३१७
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

इससे मकानका अहाता और बगीचा सहज ही भर जाता था। मुझे दर्शनार्थियोंसे सुरक्षित रखनेके लिए साथी भारी प्रयत्न करते और विफल हो जाते। एक निश्चित समय पर मुझे दर्शन देनेके लिए बाहर निकाले सिवा कोई चारा न रह जाता था। कहानी लिखनेवाले भी पाँच-सात बराबर बने ही रहते थे, तो भी दिनके अन्तमें सबके बयान पूरे न हो पाते थे। इतने सारे बयानोंकी आवश्यकता नहीं थी, फिर भी बयान लेनेसे लोगोंको सन्तोष होता था और मुझे उनकी भावनाका पता चलता था।

कहानी लिखनेवालोंको कुछ नियमोंका पालन करना पड़ता था। जैसे, हरएक किसानसे जिरह की जाये। जिरह में जो उखड़ जाये, उसका बयान न लिया जाये। जिसकी बात मूलमें ही बेबुनियाद मालूम हो, उसके बयान न लिखे जायें। इस तरह नियमोंके पालनसे यद्यपि थोड़ा अधिक समय खर्च होता था, फिर भी बयान बहुत सच्चे और साबित हो सकनेवाले मिलते थे।

इन बयानोंके लेते समय खुफिया पुलिसका कोई-न-कोई अधिकारी हाजिर रहता ही था। इन अधिकारियोंको आनेसे रोका जा सकता था। पर हमने शुरूसे ही निश्चय कर लिया था कि उन्हें न सिर्फ हम आनेसे नहीं रोकेंगे, बल्कि उनके प्रति विनयका बरताव करेंगे और दे सकने योग्य ख़बरें भी उन्हें देते रहेंगे। उनके देखते-सुनते ही सारे बयान लिये जाते थे। इसका एक लाभ यह हुआ कि लोगोंमें अधिक निर्भयता आई। खुफिया पुलिससे लोग बहुत डरते थे। ऐसा करनेसे वह डर चला गया; फिर उनकी आँखोंके सामने दिये जानेवाले बयानोंमें अतिशयोक्तिका डर कम रहता था। इस डरसे कि झूठ बोलने पर अधिकारी कहीं उन्हें फाँस न लें, उन्हें सावधानी से बोलना पड़ता था।

मैं निलहोंको खिझाना नहीं चाहता था। मुझे तो उन्हें विनय द्वारा जीतनेका प्रयत्न करना था। इसलिए जिसके विरुद्ध विशेष शिकायतें आतीं, उसे मैं पत्र लिखता और उससे मिलनेका प्रयत्न भी करता था। निलहोंके मण्डलसे भी मैं मिला था और रैयतकी शिकायतें उनके सामने रखकर मैंने उनकी बातें भी सुन ली थी। उनमें से कुछ मेरा तिरस्कार करते थे, कुछ उदासीन रहते थे, और कोई-कोई मेरे साथ सभ्यता और नम्रताका व्यवहार करते थे।

१७. साथी

ब्रजकिशोर बाबू और राजेन्द्र बाबूकी तो एक अद्वितीय जोड़ी थी। उन्होंने अपने प्रेमसे मुझे इतना पंगु बना दिया था कि उनके बिना मैं एक कदम भी नहीं बढ़ सकता था। उनके शिष्य कहिए अथवा साथी, शम्भू बाबू, अनुग्रह बाबू, धरणी बाबू और रामनवमी बाबू—ये वकील लगभग निरन्तर मेरे साथ रहते थे। विन्ध्या बाबू और जनकधारी बाबू भी समय-समय पर साथ रहते थे। यह तो बिहारियोंका संघ हुआ। उनका मुख्य काम था लोगोंके बयान लेना।

आचार्य कृपलानी इसमें सम्मिलित हुए बिना कैसे रह सकते थे? स्वयं सिन्धी होते हुए भी वे बिहारीसे भी बढ़कर बिहारी थे। मैंने ऐसे कम सेवक देखे हैं, जिनमें