वे जिस प्रान्तमें जायें उसमें पूरी तरह घुल-मिल जानेकी शक्ति हो, और जो किसी को यह मालूम न होने दें कि वे दूसरे प्रान्तके हैं। इनमें कृपलानी एक हैं। उनका मुख्य काम द्वारपालका था। दर्शन करनेवालोंसे मुझे बचा लेनेमें उन्होंने इस समय अपने जीवनकी सार्थकता समझ ली थी। किसीको वे विनोद करके मेरे पास आनेसे रोकते थे, तो किसीको अहिंसक धमकीसे। रात होने पर अध्यापकका धन्धा शुरू करते और सब साथियोंको हँसाते थे, और कोई डरपोक पहुँच जाये तो उसे हिम्मत बँधाते थे।
मौलाना मजहरुल हकने मेरे सहायकके रूपमें अपना हक दर्ज करा रखा था और वे महीने में एक-दो बार दर्शन दे जाते थे। उस समयके उनके ठाटबाट और दबदबेमें और आजकी उनकी सादगी में जमीन-आसमानका अन्तर है। हमारे बीच आकर वे हमसे हृदयकी एकता साध जाते थे, पर अपनी साहबीके कारण बाहरके आदमीको वे हमसे अलग-जैसे जान पड़ते थे।
जैसे-जैसे मुझे अनुभव प्राप्त होता गया, वैसे-वैसे मैने देखा कि चम्पारन में ठीकसे काम करना हो, तो गाँवोंमें शिक्षाका प्रवेश होना चाहिए। लोगोंका अज्ञान दयनीय था। गाँवोंके बच्चे मारे-मारे फिरते थे अथवा माता-पिता दो या तीन पैसेकी आमदनीके लिए उनसे सारे दिन नीलके खेतोंमें मजदूरी करवाते थे। उन दिनों वहाँ पुरुषोंकी मजदूरी दस पैसे से अधिक नहीं थी। स्त्रियोंकी छ: पैसे और बालकोंकी तीन पैसे थी। चार आनेकी मजदूरी पानेवाला किसान भाग्यशाली समझा जाता था।
साथियोंसे सलाह करके पहले तो छः गाँवोंमें बालकोंके लिए पाठशालाएँ खोलने का निश्चय किया। शर्त यह थी कि उन गाँवोंके मुखिया मकान और शिक्षकका भोजन-व्यय दें। उसके दूसरे खर्चकी व्यवस्था हम करें। यहाँके गाँवोंमें पैसा तो अधिक नहीं था, पर अनाज वगैरा देनेकी शक्ति लोगों में थी। इसलिए लोग अनाज देनेको तैयार हो गये।
महान प्रश्न यह था कि शिक्षक कहाँसे लाये जायें? बिहारमें थोड़ा वेतन लेने वाले अथवा कुछ न लेनेवाले अच्छे शिक्षकोंका मिलना कठिन था। मेरी कल्पना यह थी कि साधारण शिक्षकके हाथमें बच्चोंको कभी न छोड़ना चाहिए। शिक्षकको अक्षर-ज्ञान चाहे थोड़ा हो, पर उसमें चरित्रबल तो होना ही चाहिए।
इस कामके लिए मैंने सार्वजनिक रूपसे स्वयंसेवकोंकी माँग की। उसके उत्तर में गंगाधरराव देशपाण्डेने बाबासाहब सोमण और पुण्डलीकको भेजा। बम्बईसे अवन्तिका बाई गोखले आईं। दक्षिणसे आनन्दीबाई आई। मैंने छोटेलाल, सुरेन्द्रनाथ तथा अपने लड़के देवदासको बुला लिया। इसी बीच महादेव देसाई और नरहरि परीख मुझे मिल गये थे। महादेव देसाईकी पत्नी दुर्गाबहन और नरहरि परीखकी पत्नी मणिबन भी आई। मैंने कस्तूरबाईको भी बुला लिया था। शिक्षकों और शिक्षिकाओंका इतना संघ काफी था। श्रीमती अवन्तिकाबाई और आनन्दीबाईकी गिनती तो शिक्षितों में हो सकती थी, पर मणिबन परीख और दुर्गाबहन देसाईको सिर्फ थोड़ी-सी गुजराती आती थी। कस्तूरबाईकी पढ़ाई तो नहीं के बराबर ही थी। ये बहनें हिन्दी-भाषी बच्चोंको कस प्रकार पढ़ाती?