ऐसी सादी सुविधाका लाभ लोग ठीक मात्रामें उठाने लगे थे। आम तौरसे होनेवाली बीमारियाँ थोड़ी ही हैं, और उनके लिए बड़े-बड़े विशारदोंकी आवश्यकता नहीं होती। इसे ध्यानमें रखा जाये, तो उपर्युक्त रीतिसे की गई व्यवस्था किसीको हास्यजनक प्रतीत नहीं होगी। लोगोंको तो नहीं ही हुई।
सफाईका काम कठिन था। लोग गन्दगी दूर करनेको तैयार नहीं थे। जो लोग रोज खेतोंकी मजदूरी करते थे, वे भी अपने हाथ से मैला साफ करनेके लिए तैयार न थे। डा॰ देव झट हार मान लेनेवाले आदमी न थे। उन्होंने और स्वयं-सेवकोंने अपने हाथसे एक गाँवके रास्तोंकी सफाई की, लोगोंके आँगनोंसे कचरा साफ किया, कुओंके आसपास के गड्ढे भरे, कीचड़ निकाला और गाँववालोंको स्वयंसेवक देनेकी बात प्रेम-पूर्वक समझाते रहे। कुछ स्थानों में लोगोंने संकोच में पड़कर काम करना शुरू किया और कहीं-कहीं तो लोगोंने मेरी मोटरके आने-जानेके लिए अपनी मेहनतसे सड़कें भी तैयार कर दीं। ऐसे मीठे अनुभवोंके साथ ही लोगोंकी लापरवाही के कड़वे अनुभव भी होते रहते थे। मुझे याद है कि सफाईको बात सुनकर कुछ जगहों में लोगोंने अपनी नाराजी भी प्रकट की थी।
इन अनुभवोंमेंसे एक, जिसका वर्णन मैंने स्त्रियोंकी कई सभाओं में किया है, यहाँ देना अनुचित न होगा। भीतिहरवा एक छोटा-सा गाँव था। उसके पास उससे भी छोटा एक गाँव था। वहाँ कुछ बह्नोंके कपड़े बहुत मैले दिखाई दिये। इन बहनोंको कपड़े बदलनेके बारेमें समझानेके लिए मैंने कस्तूरबाईसे कहा। उसने उन बहनोंसे बात की। उममेंसे एक बहन कस्तूरबाईको अपनी झोंपड़ी में ले गई और बोली, “आप देखिए, यहाँ कोई पेटी या आलमारी नहीं है कि जिसमें कपड़े बन्द हों। मेरे पास यही एक साड़ी है, जो मैंने पहन रखी है। इसे मैं कैसे धो सकती हूँ? महात्माजी से कहिए कि वे कपड़े दिलवायें। उस दशामें मैं रोज नहाने और कपड़े बदलनेको तैयार रहूँगी।”
हिन्दुस्तान में ऐसे झोंपड़े अपवादरूप नहीं है। असंख्य झोंपड़ोंमें साज, सामान, सन्दूक पेटी, कपड़े-लत्ते कुछ नहीं होते, और असंख्य लोग केवल पहने हुए कपड़ों पर ही अपना निर्वाह करते हैं।
एक दूसरा अनुभव भी बताने योग्य है। चम्पारनमें बाँस या घासकी कमी नहीं है। लोगोंने भीतिहरवा में पाठशालाका जो छप्पर बनाया था, वह बाँस और घासका था। किसीने उसे रातको जला दिया। सन्देह तो आसपासके निलहोंके आदमियों पर हुआ था। फिरसे बाँस और घासका मकान बनाना मुनासिब मालूम नहीं हुआ। यह पाठशाला श्री सोमण और कस्तूरबाईके जिम्मे थी। श्री सोमणने ईंटोंका पक्का मकान बनानेका निश्चय किया और उनके स्वपरिश्रमकी छूत दूसरोंको लगी, जिससे देखते-देखते ईंटका मकान बनकर तैयार हो गया। और फिरसे मकानके जल जानेका डर न रहा।
इस प्रकार पाठशाला, सफाई और औषधोपचारके कामोंसे लोगोंमें स्वयं सेवकोंके प्रति विश्वास और आदरकी वृद्धि हुई और उनपर अच्छा प्रभाव पड़ा।