जाँच समितिने किसानोंकी सारी शिकायतोंको सही ठहराया और निलहे गोरों ने उनसे जो रकम अनुचित रीतिसे वसूल की थी, उसका कुछ अंश लौटाने और ‘तिनकठिया’ कानूनको रद करनेकी सिफारिश की।[१]
इस रिपोर्टके सांगोपांग तैयार होने और अन्त में कानूनके पास होनेमें सर एडवर्ड गेटका बहुत बड़ा हाथ था। यदि वे दृढ़ न रहे होते अथवा उन्होंने अपनी कुशलता का पूरा उपयोग न किया होता, तो जो सर्वसम्मत रिपोर्ट तैयार हो सकी, वह न हो पाती और आखिरमें जो कानून पास हुआ, वह भी हो न पाता। निलहोंकी सत्ता बहुत प्रबल थी। रिपोर्टके पेश हो जाने पर भी उनमें से कुछने बिलका कड़ा विरोध किया था। पर सर एडवर्ड गेट अन्त तक दृढ़ रहे और उन्होंने समितिकी सिफारिशों पर पूरा-पूरा अमल किया।
इस प्रकार सौ सालसे चले आनेवाले ‘तिनकठिया’ कानूनके रद होते ही निलहे गोरोंके राज्यका अस्त हुआ। जनताका जो समुदाय बराबर दबा ही रहता था उसे अपनी शक्तिका कुछ भान हुआ, और लोगोंका यह वहम दूर हुआ कि नीलका दाग धोये धुल ही नहीं सकता।
मैं तो चाहता था कि चम्पारन में शुरू किये गये रचनात्मक कामको जारी रखकर लोगोंमें कुछ वर्षों तक काम करूँ, अधिक पाठशालाएँ खोलूँ, और अधिक गाँवोंमें प्रवेश करूँ। क्षेत्र तैयार था। पर ईश्वरने मेरे मनोरथ प्रायः पूरे होने ही नहीं दिये। मैंने सोचा कुछ था, और दैव मुझे घसीट कर ले गया एक दूसरे ही काममें।
२०. मजदूरोंके सम्पर्क में
चम्पारन में अभी मैं समितिके कामको समेट ही रहा था कि इतनेमें खेड़ासे मोहनलाल पण्ड्या और शंकरलाल पारेखका पत्र आया कि खेड़ा जिलेमें फसल नष्ट हो गई है और लगान माफ कराने की जरूरत है। उन्होंने आग्रह-पूर्वक लिखा कि मैं वहाँ पहुँचूँ और लोगोंकी रहनुमाई करूँ। मौके पर जाँच किये बिना कोई सलाह देनेकी मेरी इच्छा न थी, न मुझमें वैसी शक्ति या हिम्मत ही थी।
दूसरी ओरसे श्री अनसूयाबाईका पत्र उनके मजदूर-संघके बारेमें आया था। मजदूरोंकी तनख्वाहें कम थीं। तनख्वाह बढ़ानेकी उनको माँग बहुत पुरानी थी। इस मामलेमें उनकी रहनुमाई करनेका उत्साह मुझमें था। लेकिन मुझमें यह क्षमता न थी कि इस अपेक्षाकृत छोटे प्रतीत होनेवाले कामको भी मैं दूर बैठकर कर सकूँ। इसलिए मौका मिलते ही मैं पहले अहमदाबाद पहुँचा। मैंने यह सोचा था कि दोनों मामलोंकी जाँच करके थोड़े समयमें मैं वापस चम्पारन पहुँचूँगा, और वहाँके रचनात्मक कामकी देखरेख करूँगा।
- ↑ देखिए खण्ड १३, पृष्४ ५९४-६१९; और खण्ड १३, पृष्ठ ६२०-६२२।