निरभिमान भावसे करते थे। उन्हें अहमदाबादके कारबारी जीवनका व्यापक अनुभव था। उन्होंने आश्रमके लिए जमीनकी खोज तुरन्त ही कर लेनेका बीड़ा उठाया। कोचरबके उत्तर-दक्षिणके भाग में मैं उनके साथ घूमा। फिर उत्तरकी ओर तीन-चार मील दूर कोई टुकड़ा मिल जाये, तो उसका पता लगानेकी बात मैंने उनसे कही। उन्होंने आजकी आश्रमवाली जमीनका पता लगा लिया। वह जेलके पास है, यह मेरे लिए प्रलोभन था। सत्याग्रह-आश्रममें रहनेवालेके भाग्यम जेल तो लिखा ही होता है। अपनी इस मान्यताके कारण जेलका पड़ोस मुझे पसन्द आया। मैं यह तो जानता ही था कि जेलके लिए हमेशा वही जगह पसन्द की जाती है, जहाँ आसपास स्वच्छ स्थान हो।
कोई आठ दिनके अन्दर ही जमीनका सौदा तय कर लिया। जमीन पर न तो कोई मकान था, न कोई पेड़। नदीका किनारा और एकान्त, ये दो बड़ी बातें जमीनके हकमें थीं।
हमने तम्बुओंमें रहनेका निश्चय किया और सोचा कि रसोई-घरके लिए टीनका एक कामचलाऊ छप्पर बाँध लेंगे और धीरे-धीरे स्थायी मकान बनाना शुरू कर देंगे।
इस समय आश्रमकी बस्ती बढ़ गई थी। लगभग चालीस छोटे-बड़े स्त्री-पुरुष थे। सुविधा यह थी कि सब एक ही रसोई-घरमें खाते थे। योजनाकी कल्पना मेरी थी। उसे अमली रूप देनेका बोझ उठानेवाले तो नियमानुसार स्व॰ मगनलाल गांधी ही थे।
स्थायी मकान बननेसे पहलेकी कठिनाइयोंका पार न था। बारिशका मौसम सामने था। सब सामान चार मील दूर शहरसे लाना होता था। इस निर्जन भूमिमें साँप आदि तो थे ही। ऐसी स्थिति में बालकोंकी सार-सँभालका खतरा मामूली नहीं था। नियम यह था कि सर्पादिको मारा न जाये। लेकिन उनके भयसे मुक्त तो हममें से कोई न था, आज भी नहीं है।
फीनिक्स, टॉल्स्टॉय फार्म और साबरमती-आश्रम, तीनों जगहों में हिंसक जीवोंको न मारनेके नियमका यथाशक्ति पालन किया गया है। तीनों जगहों में निर्जन जमीनें बसानी पड़ी थीं। कहना होगा कि तीनों स्थानोंमें सर्पादिका उपद्रव काफी था। तिस पर भी आज तक एक भी जान खोनी नहीं पड़ी। इसमें मेरे समान श्रद्धालुको तो ईश्वरके हाथका, उसकी कृपाका ही दर्शन होता है। अतः कोई यह निरर्थक शंका न उठाये कि ईश्वर कभी पक्षपात ही नहीं करता और मनुष्यके दैनिक कामोंमें दखल देनेके लिए वह बेकार नहीं बैठा है। मैं इस चीजको, इस अनुभवको, दूसरी भाषामें रखना नहीं जानता। ईश्वरकी कृतिको लौकिक भाषामें प्रकट करते हुए भी मैं जानता हूँ कि उसका ‘कार्य’ अवर्णनीय है। किन्तु यदि पामर मानव वर्णन करने ही बैठे, तो उसके पास तो उसकी अपनी तोतली बोली ही हो सकती है। साधारणतः सर्पादिको मारने पर भी आश्रम-समाजके पच्चीस वर्ष तक बचे रहनेको संयोग माननेके बदले ईश्वरकी कृपा मानना यदि वहम हो, तो वह वहम भी संग्रहणीय है।
उन दिनों जब मजदूरोंकी हड़ताल हुई, आश्रमकी नींव पड़ रही थी। आश्रम की प्रधान प्रवृत्ति बुनाई-कामकी थी। कातनेकी तो अभी हम खोज ही नहीं कर पाये थे। अतएव पहले बुनाई-घर बनानेका निश्चय किया था और उसकी नींव चुनी।