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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३५८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

२२. उपवास

मजदूरोंने शुरूके दो हफ्तोंमें खूब हिम्मत दिखाई; शान्ति भी खूब रखी; प्रति-दिनकी सभाओं में वे बड़ी संख्या में हाजिर भी रहे। प्रतिज्ञाका स्मरण मैं रोज उन्हें कराता ही था। वे रोज पुकार-पुकार कहते थे, “हम मर मिटेंगे, पर अपनी टेक कभी न छोड़ेंगे।”

लेकिन आखिर वे कमजोर पड़ते जान पड़े। और जिस प्रकार कमजोर आदमी हिंसक होता है, उसी प्रकार उनमें जो कमजोर पड़े वे मिलमें जानेवालोंका द्वेष करने लगे और मुझे डर मालूम हुआ कि कहीं वे किसीके साथ जबरदस्ती न कर बैठें। रोजकी सभा में लोगोंकी उपस्थिति कम पड़ने लगी। आनेवालोंके चेहरोंपर उदासीनता छाई रहती थी। मुझे खबर मिली कि मजदूर डगमगाने लगे हैं। मैं परेशान हुआ और यह सोचने लगा कि ऐसे समय में मेरा धर्म क्या हो सकता है। मुझे दक्षिण आफ्रिकाके मजदूरोंकी हड़तालका अनुभव था। पर यह अनुभव नया था। जिस प्रतिज्ञाके करने में मेरी प्रेरणा थी, जिसका मैं प्रतिदिन साक्षी बनता था, वह प्रतिज्ञा कैसे टूट सकती है? इस विचारको आप चाहे मेरा अभिमान कह लीजिए अथवा मजदूरोंके और सत्यके प्रति मेरा प्रेम कह लीजिए।

सवेरेका समय था। मैं सभामें बैठा था। मेरी समझमें नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। किन्तु सभामें ही मेरे मुँह से निकल गया, “यदि मजदूर फिरसे तैयार न हों और फैसला होने तक हड़तालको चला न सकें, तो मैं तब तकके लिए उपवास करूँगा।[]

जो मजदूर हाजिर थे, वे सब हक्का-बक्का रह गये। अनसूयाबहनकी आँखोंसे आँसूकी धारा बह चली। मजदूर बोल उठे, “आप नहीं, हम उपवास करेंगे। आपको उपवास नहीं करने चाहिए। हमें माफ कीजिए। हम अपनी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे।”

मैंने कहा, “आपको उपवास करनेकी जरूरत नहीं है। आपके लिए तो यही बस है कि आप अपनी प्रतिज्ञाका पालन करें। हमारे पास पैसा नहीं है। हम मजदूरोंको भीखका अन्न खिलाकर हड़ताल चलाना नहीं चाहते। आप कुछ मजदूरी कीजिए और उससे अपनी रोजकी रोटीके लायक पैसा कमा लीजिए। ऐसा करेंगे तो फिर हड़ताल कितने ही दिन क्यों न चले, आप निश्चिन्त रह सकेंगे। मेरा उपवास तो अब फैसलेसे पहले न छूटेगा।”

वल्लभभाई पटेल मजदूरोंके लिए म्युनिसिपैलिटीमें काम खोज रहे थे, पर वहाँ कुछ काम मिलनेकी सम्भावना न थी। आश्रमकी बुनाई-शालामें रेतका भराव करनेकी जरूरत थी। मगनलाल गांधीने सुझाया कि इस काममें बहुत-से मजदूर लगाये जा सकते हैं। मजदूर इसे करनेको तैयार हो गये। अनसूयाबहनने पहली टोकरी उठाई और नदीमेंसे रेतकी टोकरियाँ ढोनेवाले मजदूरोंकी एक कतार खड़ी हो गई। वह दृश्य देखने योग्य था। मजदूरोंमें नया बल आ गया। उन्हें पैसे चुकानेवाले चुकाते-चुकाते थक गये।

  1. उपवासके दौरान दिये गये भाषणोंके लिए देखिए खण्ड १४, पृष्ठ २४३-४५ और २४७-२५०।